नगर निगम में हंगामा क्यों !
जब से नगर निगम बना है कि तब से आज तक भाजपा का ही मेयर रहा है। जाहिर है कि अगर विकास की बात आयेगी तो फिर भाजपा अपने आप को बचा नहीं सकती है क्योंकि जब लगातार भाजपा का ही मेयर है तो वो ये आरोप नहीं लगा सकती कि विपक्ष का मेयर रहा इसलिए विकास कार्य नहीं हो रहा है। हालांकि प्रदेश में सरकारें जरूर गैर भाजपाई रही हैं लेकिन फिर भी जो मेयर रहे वो लगातार सरकार से लडकर फंड लाते रहे और विकास कराते रहे। चाहे अशु वर्मा हों या फिर तेलूराम काम्बोज या दिनेश गर्ग रहे हो अथवा दमयंति गोयल रही हों। इनके जमाने में गैर भाजपाई सरकारें भी रहीं लेकिन विकास भी हुआ और नगर निगम बोर्ड की बैठक में हंगामे होते थे लेकिन कभी भी व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप नहीं लगते थे। बहस खूब होती थी लेकिन वो अच्छे माहौल में होती थी। हालांकि एक बार बोर्ड बैठक में हथियार भी निकल आये थे लेकिन उसे भी बहुत ही खूबसूरत तरीके से उस समय के मेयर ने मामले को निपटा दिया था। आज स्थिति ये है कि नगर निगम में विपक्ष की भूमिका भी भाजपा ही निभा रही है। आज निगम में विपक्ष के पार्षद कोई हंगामा नहीं करते। आज भाजपा बनाम भाजपा निगम में दिखाई दे रहा है। भाजपा के पार्षद ही सरकारी अफसरों पर और मेयर पर निशाना लगा रहे हैं। तो वहीं चाहे अफसर हों या मेयर हों उनके निशाने पर भी भाजपा के ही पार्षद हैं। २०२७ विधानसभा चुनाव में अब कम समय बाकी है। सौ दिन बाद आचार संहिता लग जायेगी और फिर विकास कार्य रूक जाएंगे। जरूरत इस बात की है कि ऐसे माहौल में जब चुनाव सिर पर हों तो हंगामा ठीक नहीं है। दरअसल, निगम एक मिनी सरकार है और शहर के विकास की जिम्मेदारी भी निगम पर ही है। हाउस टैक्स को लेकर पहले से ही निगम की कार्यप्रणाली को लेकर जनता में रोष रहा है। हालांकि मेयर सुनीता दयाल पहले दिन से ही हाउस टैक्स को लेकर जनता के साथ खड़ी रहीं लेकिन जो संदेश जाना था वो चला गया। आज अगर सभी पार्षद मिलकर विकास पर चर्चा करें तो ज्यादा अच्छा है। निगम का एक प्रॉटोकॉल भी है उसका पालन भी होना चाहिए। व्यक्तिगत और मूंछों की लड़ाई में एक दूसरे का सम्मान भी नहीं भूलना चाहिए। जो काम विपक्ष के पार्षद करते वो आज भाजपा में हो रहा है। एक दूसरे के खिलाफ शिकायत की बात की जा रही है। इससे अच्छा संदेश नहीं जा रहा है।
जय हिंद