रातों-रात नहीं बनी सेंट्रल मार्किट
आज की सुबह मेरठ स्थित सेंट्रल मार्किट से जुड़े लोगों के लिए एक ऐसी बेडमॉनिंग लेकर आई जो शायद हमेशा के लिए याद रहेगी। तमाम कोशिशों के बाद भी सेंट्रल मार्किट नहीं बची और एक्शन शुरू हो गया। क्या सेंट्रल मार्किट रातों-रात बन गई? क्या किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी? क्या किसी सरकार में किसी अफसर को अवैध निर्माण नहीं दिखाई दिया? क्या बिना अफसरों की जानकारी के रातों-रात सेंट्रल मार्किट बन गई? ये बड़े सवाल हैं। अवैध निर्माण क्या अधिकारियों की जानकारी के बिना हो जाएगा। आज हजारों परिवार सेंट्रल मार्किट से जुड़े थे। बड़े-बड़े सपने थे आज सब विरान हो गये। आज हजारों परिवार सडक़ पर आ गया। जो अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार थे उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी? भले ही वो अधिकारी सेवा निवृत्त हो गये हों लेकिन जवाबदेही तय होना चाहिए। अवैध निर्माण की इजाजत नहीं देना चाहिए। नियम और कानून के हिसाब से ही काम करना चाहिए लेकिन क्या इसका जिम्मेदार आम आदमी है। सरकारी तंत्र नहीं है। बड़े-बड़े राजनेता वोट मांगते हैं और हमेशा साथ खड़े रहने की बात कहते हैं लेकिन आज कोई भी किसी के साथ नहीं खड़ा है। अस्पताल ढहा दिये गये, स्कूल ढहा दिये गये, आखिरकार इसके पीछे असली कौन जिम्मेदार है उसकी जिम्मेदारी भी तय होना चाहिए। उत्तर प्रदेश हो या अन्य राज्य हों, अगर गहराई से जांच होगी तो आधे देश में अवैध निर्माण दिखाई देगा। शहर के शहर में बड़े निर्माण हैं, क्या वो सब अवैध हंै? अगर जांच होगी तो दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जायेगा। सडक़ों पर अवैध निर्माण, नालों पर अवैध निर्माण, सरकारी पार्कों मे अवैध निर्माण लेकिन किसी की कोई नजर नहीं पड़ती और ये निर्माण बिना अफसरों की मिलीभगत से हो ही नहीं सकता। कहीं व्यवस्था का खेल तो कहीं बड़ी पहुंच का तो कहीं बड़े नेताओं का हाथ होता है। पूरे प्रदेश का यही हाल है। बहरहाल, सेंट्रल मार्किट पर एक्शन और उससे जुड़े हुए लोग आज जिस मुहाने पर खड़े हैं जिस हाल में खड़े हैं इसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल होगा। अपने सपने अपने सामने चकनाचूर होता देख रहे हैं। बहरहाल, अवैध निर्माण पर चाबुक चले लेकिन जब निर्माण शुरू हो तभी कार्रवाई हो सालों बाद जो एक्शन होता है तो फिर सपने चकनाचूर होना स्वाभाविक है। जय हिंद