दो दशकों में बदली तस्वीर
सरकारी मशीनरी दो दशक पहले कभी भी राजनीतिक दबाव में काम नहीं करती थी। लेकिन अब अफसरों का राजनीतिकरण हो गया है। जैसे सरकार बदलती है वैसे ही नई सरकार पुराने अफसरों को साइड कर देेती है। जबकि अफसर तो अफसर है कोई सरकार आये कोई सरकार जाये उसे अपना काम करना है लेकिन जब सरकारी अफसर एक कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगते हैं तो फिर लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है। दो दशकों से कुछ ऐसी ही तस्वीर है। यही कारण है कि आज अफसरों को पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में देखा जाने लगा है। राजनीतिक दबाव में इतना काम कर रहे है जिसकी कई नजीर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के अफसरों को जिस तरह फटकार लगाई है वो सबके सामने है। कोर्ट ने स्पष्टï कहा कि सर्विस में आते समय जो शपथ लेते हैं उसको भूल गये और राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी एक मजिस्टे्रट द्वारा एक छात्र को नोटिस दिये जाने से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इतने नाराज हुए। उन्होंने कहा कि अदालत के आदेश के बाद कैसे हिम्मत हुई नोटिस जारी कर दिया। दरअसल अफसरों को लगता है कि वो जिस कुर्सी पर बैठे हैं वही सबकुछ है और उनके राजनीतिक आका उनको बचा लेंगे। हालांकि ऐसा होता भी है कई घटनाओं में अदालतों के आदेश के बाद भी अफसरों ने राजनीतिक दबाव में काम किया है। तीसरी आंख ने देखा कि जिसकी सरकार आयी उसने अपने हिसाब से अफसर तैनात किये। चाहे कोई कितना ही काबिल अफसर हो उसे साइड कर दिया गया। ऐसा पहले कभी नहीं होता था। गाजियाबाद के प्रथम जिलाधिकारी जो १४ नवंबर १९७६ को पहले डीएम बने थे एनएन वर्मा। एक बार उनसे बातचीत हुई ये बातचीत तब हुई थी जब पहली बार मुख्यमंत्री मायावती ने हापुड़ के बछलौता गांव में गाजियाबाद के डीएम आरके मिश्रा को सस्पेंड कर दिया था। ये किसी डीएम का पहला सस्पेेंशन था। हापुड़ उस समय गाजियाबाद में था। तब एनएन वर्मा ने बताया था कि कभी भी मुख्यमंत्री का डीएम के काम हस्तक्षेप नहीं होता था। सस्पेंशन तो दूर तीन साल से पहले तबादला भी नहीं होता था। उन्होंने बताया कि केवल मुख्य सचिव ही बात करते थे और कोई काम होता था तो मुख्य सचिव ही बताते थे कि माननीय मुख्यमंत्री ऐसा चाहते हैं क्या संभव है। बाकी कोई दबाव कभी नहीं होता था। आज स्थिति बदल गई। दो दशकों में अफसर बिल्कुल राजनीतिक दबाव में काम करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की फटकार, हाईकोर्ट की फटकार इस बात का सबूत है कि अफसर किस तरह राजनीतिक दबाव में कर रहे हैं। हालांकि आज भी कुछ अफसर कि वो दबाव नहीं मानते यही कारण है कि या तो वो ज्यादा दिन तक कुर्सी पर रहते नहीं हैं या फिर साइड पोस्टिंग में रहते हैं। बहरहाल, अफसरों को चाहिए कि सरकार आती-जाती रहती है उनके ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और वो जनता के लिए ही कुर्सी पर बैठे हैं और जनता के प्रति ही जवाबदेह भी है। सरकार तो पांच साल दस साल में चली जाती है लेकिन उनके पास लंबा समय रहता है और लोग उनसे बहुत उम्मीद करते हैं। जय हिंद