इससे भी होता आंकलन
चाहे राजनेता हो या फिर समाज से जुड़े हुए व्यक्ति उनके यहां होने वाले कार्यक्रम से इस बात का पता चलता है कि लोग उनसे कितना प्यार करते हैं। चुनावी मौसम में जन्मदिन का अपना एक अलग ही महत्व है। अब जन्मदिन भी एक तरह से शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गये। किस नेता के जन्मदिन पर कितनी पब्लिक आयी इससे उनकी पकड़ का आंकलन भी किया जाता है। अब आंकलन के तरीके बदल गये हैं। हालांकि एक दशक से कुछ ज्यादा ही जन्मदिन मनाने का प्रचलन हो गया। कुछ नेता ऐसे होते हैं जो चुनावी मौसम में ही अपना जन्मदिन मनाते हैं। चुनावी मौसम खत्म हो जाता है तो फिर कोई जन्मदिन नहीं मनता। लोग भी चुनावी मौसम के हिसाब से ही बधाई देने जाते हैं। उनको लगता है कि अगर टिकट मिल गया और जनप्रतिनिधि बन गये तो कम से कम जो बुके दिये गये हैं वो नेता जी जरूर याद रखेंगे। गाजियाबाद में कई ऐसे बड़े नेता हैं जिन्होंने चुनावी मौसम में बड़े जोर-शोर के साथ अपने जन्मदिन मनाये, उसमें पब्लिक भी आयी, कार्यकर्ता भी आये और बड़ा मजबूत तरीके से जन्मदिन का इंतजाम किया गया। इस तरह के जन्मदिन लोकसभा चुनाव से पहले भी मने, विधानसभा चुनाव से पहले भी मनाये गये लेकिन फिर उसके बाद कोई जन्मदिन बड़े नेताओं ने नहीं मनाया। मुझे याद है कि पूर्व राज्यसभा सांसद अनिल अग्रवाल ने बहुत ही धूमधाम के साथ अपना जन्मदिन मनाया था। तब चुनावी मौसम था। लोकसभा चुनाव से पहले दर्जा राज्यमंत्री कैप्टन विकास गुप्ता ने भी अग्रसेन भवन में अपना जन्मदिन मनाया था इसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओ ने भाग लिया था और एक मजबूत पकड़ का संदेश दोनों नेताओं ने दिया था। चुनावी मौसम खत्म हुआ, टिकट नहीं मिला तो फिर जन्मदिन मनाने का सिलसिला भी खत्म हो गया। हालांकि हर नेता धूमधाम से अपना जन्मदिन नहीं मनाता है। लोकसभा सांसद अतुल गर्ग का जन्मदिन था उन्होंने एक दिन पहले ही एक वीडियो डाली थी जिसमें बताया था कि वो बाहर हैं। उसके बाद भी बड़ी संख्या में लोग घर पहुंचे लेकिन मायूस लौटे क्योंकि सांसद जी बाहर थे। वैसे भी अतुल गर्ग कोई बड़ा आयोजन अपने जन्मदिन पर नहीं करते। उनको लगता है कि जो लोग उनके साथ हैं वो हमेशा हैं और उन्हें अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की कोई जरूरत नहीं है। मेयर सुनीता दयाल भी धूमधाम से अपना जन्मदिन नहीं मनाती। बहरहाल, जन्मदिन मनाना कोई गलत नहीं है। खुशी का पर्व है धूमधाम से मनाया जाए या सादगी से ये अलग बात है लेकिन बदलती तस्वीर है आज लोग कार्यक्रमों से नेताओं की पकड़ का अहसास करते हैं। यही कारण है कि कोई कार्यक्रम हो उसका इतना प्रचार-प्रसार होता है ताकि जनता में एक अच्छा संदेश जाए। पहले की और आज की राजनीति में यही फर्क है। जय हिंद