गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट की भी अजीब स्थिति है। बैठकें दिन में कई कई हो जाती हैं, मगर उनका धरातल पर कोई परिणाम दिखता नहीं है। नियमित तौर पर होने वाली बैठकों के औचित्य पर विभाग के लोग ही सवाल उठाने लगे हैं, मगर दबी जुबान में, क्योंकि डर है कि कहीं बात खुल गई तो बड़े साहब नाप ना दें। काम में लापरवाही, पीडि़त की सुनवाई ना होना, आदि आदि अनेक आरोपों में कितने ही पुलिसकर्मी कार्रवाई का शिकार हो चुके हैं, मगर इसका कोई व्यापक असर देखने को मिलता नहीं हैं। क्योंकि उनके व्यवहार में कोई बदलाव है नहीं। गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट में ट्रफिक पुलिस का लंबा चौड़ा हिसाब किताब है। मतलब एक बड़ा अमला गाजियाबाद यातायात पुलिस के पास है। मगर गाजियाबाद मं यातायात की स्थिति क्या है, यह किसी से छुपा नहीं है। शहर में कितने ही प्वाईट ऐसे हैं जहां यातायात जाम होना अब लोगों की आदत में शुमार हो चुका है।
लोगों ने यातायात जाम को नीयति मान लिया है। मगर इसमें सुधार होता दिखता ही नहीं है। हालात तो यह हैं कि कितने ही चौराहों पर तो पुलिकर्मी नजर भी नहीं आते। रेड लाइट जंप करते वाहन, हूटर बजाती गाडिय़ां, काली फिल्म आप पूरे गाजियाबाद में कहीं भी देख सकते हैं। मगर शायद पुलिस को यह सब दिखाई नहीं देता। क्योंकि दिख रहा होता तो सडक़ पर यह सब नहीं हो रहा होता। मगर लोग जाम में फंस भी रहे हैं, गाड़ी हूटर भी बजा रही हैं और रेड लाइट जंप भी किए जा रहे हैं। जहां तक बात अपराध नियंत्रण की है तो पुलिस के आंकड़े तो बता रहे हैं कि अपराध पर लगाम कसी हुई है। मगर शायद ही कोई ऐसा दिन जाता है जिस दिन, चोरी, छेड़छाड़, छिनैती आदि की घटनाएं सामने नहीं आती हों। अब तो साइबर अपराध भी होते हैं। पुलिसकर्मी बतातें हैं कि बड़े साहब मीटिंग रोज लेते हैं। कभी कभी तो एक ही दिन में कई मिटिंग हो जाती हैं। अब सवाल यह है कि जब बड़े साहब इतने ही सक्रिय हैं तो पुलिसकर्मी सडक़ से नदारद क्यों हैं? कार्रवाई के बावजूद पुलिसकर्मियों के व्यवहार में बदलाव क्यों नहीं है? शहर जाम से मुक्त क्यों नहीं है?