प्रदेश की लगभग सभी तहसीलों में बार एसोसिएशन आजकल हड़ताल पर हैं। गाजियाबाद में भी तहसील बार की हड़ताल चल रही है। बताया जा रहा है कि हड़ताल ई-रजिस्ट्री और निजीकरण के विरोध में हैं। ई-रजिस्ट्री और निजीकरण के विरोध के बीच तहसील के वकीलों के कई आरोप सरकार पर हैं। इनका कहना है कि दोनों कार्यों की वजह से तहसील बार के वकीलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। आय प्रभावित होगी तो परिवार भी प्रवाहित होंगे। आर्थिक नुकसान केवल वकीलों का ही नहीं होगा, बल्कि इसकी जद में वेंडर, बैनामा लेखक, टाइपिस्ट, स्टांप विक्रेता, तहसील परिसर में काम करने वाले अन्य सभी दुकानदार भ्री आएंगे। सभी को नुकसान होगा। ऐसी बातों से लगता है कि तसील बाद के वकील वाकई संकट में हैं। दूसरी तरफ सरकार का पक्ष समझने का प्रयास करते हैं तो लगता है कि तहसील बार का विरोध जायज नहीं है। सरकार ऑनलाइन रजिस्ट्री चाहती है। इसके लिए आदेश भी जारी कर दिए गए हैं। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण एवं आवास विकास जैसी संस्थाएं अब अपने कार्यालय से ही ऑनलाइन रजिस्ट्री कर लिया करेंगे। इससे संस्थाओं का समय बचेगा तो रजिस्ट्री कराने वालों का खर्च कम हो जाएगा। यदि कोई दो लोग भी रजिस्ट्री करना चाहेंगे तो अभी इस प्रोसेस को सीखने में वकीलों को समय लगेगा, तत्काल तो वह ऐसा कर नहीं सकते। अधिकतर वकीलों को ऑनलाइन रजिस्ट्री करना आता भी नहीं होगा। दूसरी बात ऑलाइन रजिस्ट्री होगी तो तहसील बार के टोकन को खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अभी तक हर रजिस्ट्री पर बार का टोकन लेना ही पड़ता है। बताया जाता है कि बार के टोकन की कीमत करीब 12 सौ रुपए का है। यह तहसील बार की अपनी कमाई होती है, जो ई-रजिस्ट्री से बंद हो जाएगी। बार का तो नुकसान होगा मगर रजिस्ट्री कराने वाले के पैसे बच जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक प्रतिदिन होने वाली कुल रजिस्ट्री की तीस प्रतिशत रजिस्ट्री जीडीए या आवास विकास जैसी संस्थाओं की ही होती है। यह अपने आप में एक बड़ी संख्या है। दूसरा सरकार की मंशा है कि तसहील में क्योंंकि जमीनों की रजिस्ट्री ही मुख्य काम है तो वहां केवल बैनामा लेखक ही बैठें। वकीलों का रजिस्ट्री में कोई काम नहीं होता, उनका काम विवादों का केस लडऩा है। इस पर भी वकील नाराज हैं। पाठक ही तय करें कि सरकार सही है या तहसील बार।