गंभीर मुद्दे भी अब नहीं उठते
जब कहीं किसी की कोई सुनवाई नहीं होती तो फिर लोग न्यायपालिका और मीडिया के सहारे अपनी बात रखते हैं। कुछ समय से न्यायपालिका तो जरूर अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। हालांकि कई मामलों में न्यायपालिका पर भी सवाल उठाये जाते हैं लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं आज अगर न्यायपालिका निष्ठा के साथ निष्पक्ष होकर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएं तो ना जाने क्या सूरत बन जाए। आज भी न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रही है लेकिन लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाला मीडिया आज खामोश हो गया है। मीडिया की खामोशी पर जनता सवाल उठाती है। अब खुलकर मीडिया को न जाने किन-किन नामों से पुकारा जाने लगा है जो सही नहीं है। वास्तव में कई गंभीर मुद्दे इस देश में मौजूद हैं लेकिन उस पर कोई भी बहस नहीं होती, उसकी कोई कवरेज नहीं होती, जनता खुद सवाल करती है कि मीडिया बिक चुका है। ये बिकाऊ शब्द उन जांबाज पत्रकारों की आत्मा को झकझोरती है जिनकी कलम ने कभी समझौता नहीं किया। जाहिर है कि एक गंदी मछली जिससे पूरा तालाब गंदा कहा जाता है। दरअसल, मीडिया घरानों की कमान पूंजीपतियों के हाथ में आने के बाद आज श्रमजीवी पत्रकार घर बैठ गये हैं। देश के कई नामवर पत्रकार अपने यूटयूब चैनल के जरिए अपना घर भी चला रहे हैं और अपनी भड़ास भी निकाल रहे हैं। ठीक है कहीं ना कहीं कुछ मजबूरियां रहती है लेकिन ऐसा नहीं है कि सबकुछ देखने के बाद भी आंखों पर पट्टी बांध ली जाए। जिस मीडिया पर जनता भरोसा करती है उस भरोसे पर खरा उतरना मीडिया की जिम्मेदारी है। मीडिया एक मिशन है और इस मिशन को बनाए रखना भी जरूरी है। आज जब मीडिया को बिकाऊ मीडिया कहा जाता है या गोदी मीडिया कहा जाता है तो फिर पूरा मीडिया समाज कंलकित हो जाता है। चंद लोगों के कारण मीडिया को बिकाऊ कहा जाने लगा है। अब वो शेर भी बहुत बेमाना हो गया है-
खींचो ना कमानों को ना तलवार निकालो।
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।।
जय हिंद