जेन जेड के आंदोलन और केन्द्र सरकार को लेकर कई तरह की बातें सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि जंतर मंतर पर हुए पूरे घटनाक्रम पर आईबी, गृह मंत्रालय और आरएसएस की तीन अगल अलग रिपोर्ट सरकार के पास आईं। तीनों में बताया गया कि जनता और खासकर युवाओं के बीच सरकार के प्रति नाराजगी और गुस्सा बढ़ रहा है। आंदोलन के पूरे देश में फैलने की बात कही गई जिससे सरकार की चिंता बढ़ गई। याद कीजिए वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव, इस चुनाव में भाजपा ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी को प्रस्तुत किया था। देश का युवा खुलकर भाजपा के समर्थन में था और मोदी-मोदी चिल्ला रहा था। हर-हर मोदी, घर-घर मोदी के नारे गूंज रहे थे। उस समय कोई मोदी के खिलाफ एक शब्द सुनने को तैयार नहीं था। मोदी है तो मुमकिन है, मोदी है तो भारत है जैसे नारे लोगों की जुबान पर थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 282 सीटें जीतकर इतिहास लिख दिया था, एक अरसे के बाद किसी दल को पूर्ण बहुमत मिला था। मगर अब तकरीबन 12 वर्ष बाद स्थिति बदल चुकी है। अब का युवा मोदी के विरोध में नारे लगा रहा है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगा जा रहा था मगर निशाने पर मोदी ही रहे। इससे साफ नजर आने लगा कि अब नई पीढ़ी के बीच पीएम मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ गिरने लगा है। यह भाजपा के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। अगले साल यूपी समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। अब यह कहना कठिन होगा कि टिकट कोई ले आए वोट तो मोदी के नाम पर मिलेंगे ही। पहले राम मंदिर चढ़ावा चोरी को लेकर लोगों मेंं नाराजगी पैदा हुई थी। राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में सरकार की और से कार्रवाई में की गई देरी लोगों को बर्दाश्त नहीं हुई। यह मामला चल ही रहा था नीट पेपर लीक को लेकर गुस्साया युवा सडक़ पर आ गया। दोनों घटनाओं का विपरीत असर भाजपा पर ही पड़ा है। जंतर मंतर के आंदोलन के बाद अगर भाजपा और सरकार डरें हैं तो यह डर गलत नहीं है। क्योंकि अगर इस डर पर जीत नहीं पाई गई, जनता के विश्वास को बनाकर नहीं रखा गया तो हार मिलने की आशंका अधिक बढ़ जाती है।