कितनी हैरत की बात है कि गाजियाबाद में खिलाडिय़ों की बात पर कोई बोलने का तैयार नहीं हो रहा है। सत्ता पक्ष को तो कोई जरूरत नहीं है, और विपक्ष को तो जैसे सांप सूंघ गया है। आप कभी महामाया स्टेडियम घूम कर आइए। वहां किसी भी खिलाड़ी से दो मिनट बात कर लीजिए, पहले तो वह बोलने में सुकंचाएगा, क्योंकि उसे डर रहता है कि कहीं स्टेडियम प्रबंधन को पता चल गया तो कोई कोई बहाना खोजकर उसे निष्कासित किया जा सकता है। मगर जब उसे यकीन हो जाएगा कि आप कोई नुकसान नहीं करेंगे तब वह अपना दर्द बता देगा। कितनी परेशान कर देने वाली बात है कि दिल्ली के करीबी, प्रदेश के प्रवेश द्वार गाजियाबाद में खेल सुविधाओं का अभाव है। खेल विभाग की हिम्मत देखिए कि जिस शहर में महीने में कई बार मुख्यमंत्री का आना जाना लगा रहता हो, वहां समस्याएं और असुविधाएं हैं, मगर कोई कुछ कर नहीं है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दल गाजियाबाद से चुनाव जीतने का सपना देखते हैं, मगर सैंकड़ों खिलाडिय़ों का दर्द उन्हें महसूस नहीं होता। भाजपा के मंत्री, सांसद, विधायकों की तो बात ही छोड़ दीजिए, उनको तो पता है चुनाव में वोट तो मोदी-योगी के नाम पर मिल ही जाएंगे। जब वोट की चिंता ही नहीं है तो समस्या खिलाडिय़ों की हो या किसी और की उन्हें क्यों कुछ फर्क पडऩे लगा। मगर फर्क पड़ता है खिलाडिय़ों को, उनके परिजनों को। क्योंकि परिजन अपने बच्चों के सपनों को रोज टूटता देखते हैं। जिन लोगों को अपने शहर के बच्चें से प्यार नहीं, लगाव नहीं, क्या उन्हें नेतृत्व कर्ता अर्थात नेता कहना उचित होगा? अरे खिलाड़ी मांग क्या रहें हैं, खेल सुविधाएं ही ना, गायिजाबाद के जनप्रतिनिधि यहां के अधिकारी उन्हें इतना भर भी नहीं दे पा रहे हैं। कल को अगर गाजियाबाद का कोई खिलाड़ी किसी और शहर से अभ्यास करके कुछ अर्जित कर ले ना तो आप देखिएगा हमारे यही सब नेता, फिर वह चाहे सत्ता के हों या विपक्ष के उसके साथ फोटो खिंचवाते मिलेंगे। बस आज उनके पास अपने खिलडिय़ों के लिए ना समय है, ना शब्द।