गाजियाबाद एनसीआर के तेजी से विकसित होते शहरों में अपनी अलग पहचान बना चुका है। ऊंची इमारतें, बड़े-बड़े मॉल, आवासीय सोसायटियां, चौड़ी सडक़ों और आधुनिक सुविधाओं के दावे शहर के विकास की तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन इस चमकती तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे रोजाना सडक़ों पर निकलने वाला आम नागरिक महसूस करता है। यह पहलू है शहर की बिगड़ती यातायात व्यवस्था। गाजियाबाद में घर से निकलने के बाद अपने गंतव्य तक समय पर पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। सुबह कार्यालय जाने का समय हो या शाम को घर लौटने का वक्त, शहर के अनेक प्रमुख मार्गों पर वाहनों की लंबी कतारें आम बात हो गई हैं। चौधरी मोड़, हापुड़ चुंगी, लालकुआं, मोहननगर, नया बस अड्डा, राजनगर एक्सटेंशन और इंदिरापुरम जैसे इलाकों में यातायात का दबाव नागरिकों की दिनचर्या को प्रभावित कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? शहर में यातायात की समस्या का एक बड़ा कारण सडक़ों पर बढ़ता अतिक्रमण और अवैध पार्किंग है। दुकानों के बाहर तक फैला सामान, सडक़ किनारे खड़े वाहन, निजी बसों और व्यावसायिक वाहनों का अनियंत्रित संचालन तथा फुटपाथों पर कब्जे ने सडक़ों की वास्तविक चौड़ाई को कम कर दिया है। जिन रास्तों का इस्तेमाल सुचारु यातायात के लिए होना चाहिए, वहां अव्यवस्था दिखाई देती है। दूसरी ओर शहर का विस्तार तो तेजी से हुआ, लेकिन उसके अनुपात में सडक़, पार्किंग और यातायात प्रबंधन की व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी। नई-नई आवासीय सोसायटियां और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनते गए, लेकिन उनके आसपास की सडक़ों पर बढऩे वाले वाहनों के दबाव का स्थायी समाधान नहीं तलाशा गया। यातायात पुलिस की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। केवल चालान काटने और कैमरों से निगरानी करने से यातायात व्यवस्था दुरुस्त नहीं हो सकती। जरूरत इस बात की है कि प्रमुख चौराहों और जाम वाले स्थानों पर नियमित निगरानी हो, गलत दिशा में वाहन चलाने वालों पर कार्रवाई हो और यातायात नियमों का पालन कराया जाए। यह भी समझना होगा कि समस्या केवल यातायात पुलिस के भरोसे नहीं सुलझ सकती। नगर निगम, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग और एनएचएआई को आपसी समन्वय के साथ काम करना होगा। सडक़ निर्माण, अतिक्रमण हटाने, पार्किंग स्थलों की व्यवस्था, खराब सिग्नलों की मरम्मत और चौराहों के बेहतर डिजाइन जैसे विषयों पर ठोस कार्ययोजना बनानी होगी। सबसे अधिक परेशानी स्कूली बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं, दिव्यांग नागरिकों और आपातकालीन सेवाओं को होती है। जाम में फंसी एंबुलेंस केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी से जुड़ा गंभीर विषय है। प्रशासन को चाहिए कि शहर के प्रत्येक प्रमुख जाम स्थल का अलग-अलग अध्ययन कराया जाए। जहां पार्किंग की कमी है, वहां व्यवस्थित पार्किंग बनाई जाए। जहां अतिक्रमण है, वहां निष्पक्ष कार्रवाई हो। यातायात प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए उसकी प्रभावशीलता की नियमित समीक्षा भी हो। यह भी सच है कि नागरिकों की जिम्मेदारी कम नहीं है। गलत दिशा में वाहन चलाना, सिग्नल तोडऩा, सडक़ पर मनमाने ढंग से वाहन खड़ा करना और लेन अनुशासन का पालन न करना भी जाम को बढ़ाता है। इसलिए प्रशासनिक सख्ती के साथ नागरिक जागरूकता भी जरूरी है।