गाजियाबाद (युग करवट)। युग करवट केवल समाचार पत्र ही नहीं है। यह गाजियाबाद के लोगों के साथ दिल का रिश्ता रखने का माध्यम भी है। यह बात भाजपा नेता एवं शिक्षाविद अश्वनी शर्मा ने कही। भाजपा नेता अश्वनी शर्मा ने कहा कि सबसे पहले युग करवट को दो दशक पूरे करने पर मेरे परिवार की तरफ से हार्दिक मंगलकामनाएं। दो दशक में युग करवट ने अपनी जो पहचान बनाई है उसमें सटीक और निष्पक्ष खबरों का तो अपना स्थान है ही लेकिन इस समाचार पत्र के संपादक या यूं कहूँ की पाठकों के दिलों पर राज करने वाले सलामत जी की भूमिका अहम है। अश्वनी शर्मा कहते हैं कि इस बात को सार्थक करती हुई पर एक अविस्मरणीय घटना का उल्लेख करना आवश्यक है। बात कुछ वर्षों पहले की है। मेरे घर प्रतिदिन युग करवट शाम 4 बजे तक पहुंच जाया करता था। मेरे पिता रिटायर्ड इंजीनियर हैं, जिन्हें इस समाचार पत्र को पढऩे की बहुत उत्सुकता हमेशा रहती थी। उसका एक बड़ा कारण ये भी था कि मेरी राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी उन्हें इसी अखबार को पढ़ कर मिल जाती थी। फिर वो इसकी चर्चा मेरी माताजी से भी करते थे और इस तरह मेरी माताजी को भी युग करवट की आदत पड़ गयी। अश्वनी शर्मा बताते हैं कि एक दिन किसी कारण से अखबार नहीं आ पाया। जब मैं शाम को घर पहुंचा तो मेरी माताजी ने शिकायत करते हुए मुझसे कहा कि आज तेरा करवट न आया। वो अक्सर अखबार का अधूरा नाम ही लेती थीं। ये सुनकर मंैने उनका मन रखने के लिए सलामत जी को यूं ही अनमने मन से कॉल मिला दिया और सारी बात बताई। सलामत जी ने भी आश्चर्य प्रकट किया कि आज अखबार क्यों नहीं पहुंचा। फोन काटने के बाद मैंने माताजी को समझा दिया कि किसी वजह से नहीं आ पाया लेकिन कल जरूर आयेगा। वह संतुष्ट हो गईं। बात सामान्य सी थी, लगभग आधा घंटे बात गेट पर एक कार आकर रुकी और गेट की घंटी बजी। मैं जब गेट खोलने गया तो यह देख कर चकित रह गया कि सलामत जी खुद अखबार की एक प्रति लेकर मेरे सामने खड़ेे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे कि मैं क्या प्रतिक्रिया दूं, क्या करूं। मैं उन्हें सम्मानपूर्वक अंदर लेकर गया। अपने माताजी पिताजी से मिलवाया। उस बात चीत के दौरान मैने उनसे कहा कि आपने क्यों कष्ट किया, अखबार तो कल भी आ जाता। लेकिन उन्होंने जो कहा वो आज भी मुझे अक्षरश: याद है।
उन्होंने कहा कि माताजी आज का अखबार पढ़े बिना रह जाये ये मुझे गवारा नहीं हुआ। मेरे पाठक इस उम्र में भी युग करवट से इतना स्नेेह रखते है ये मेरे लिए गौरव की बात हैं।
अश्वनी शर्मा कहते हैं कि मैं आज भी जब इस घटना को याद करता हूं तो बस दिल में एक ही बात आती है कि क्या कोई संपादक किसी के माता पिता की खुशी के लिए ये भी कर सकता है। लेकिन फिर अहसास होता है कि युग करवट के संपादक सलामत जी अनोखे है जो पाठकों से खबरों का ही नहीं बल्कि व्यवहार का रिश्ता रखते हैं।