बांकीपुर विधानसभा का परिणाम
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के परिणाम से ना बिहार सरकार पर कोई असर पर पड़ रहा है और ना ही केंद्र की सरकार पर कोई असर है। बांकीपुर विधानसभा का परिणाम इस बात का संकेत है कि जनता से बड़ी अदालत कोई नहीं है। ये एक तरह से घर में हार है और घर की हार बाहर वालों के लिए एक शुभ संकेत होता है। कोई भी क्षेत्र हो उसमें हार-जीत अलग होती है लेकिन अगर कोई व्यक्ति घर में हारता है तो फिर सवाल खड़े होते हैं। बांकीपुर विधानसभा पर कई दशकों से भाजपा का कब्जा रहा है। इस सीट पर मौजूदा भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के पिता भी जीतते रहे हैं उनके बाद नितिन नबीन की माता को टिकट मिला लेकिन फिर बदल गया और नितिन नबीन इस सीट से जीते। भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया गया तब ये सीट खाली हुई और फिर उपचुनाव हुआ। भाजपा हाईकमान का मानना था कि इस सीट पर किसी भी पुतले को भी भाजपा का टिकट दे दिया जाए तो वो भी जीत जाएगा। लेकिन जनता ने दिखा दिया कि कोई भी सीट किसी की बपौती नहीं है और ना ही जनता किसी की बंधुआ मजदूर है। भाजपा की इस सीट पर हार बहुत बड़ा संकेत है। राष्टï्रीय अध्यक्ष वाली सीट हारना अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करती है। एक कहावत चली आ रही थी कि भाजपा का टिकट मानो जीत का सर्टीफिकेट, ये हो भी रहा था। ऐसे-ऐसे लोग जीत गये जो शायद अपने दम पर पार्षद का भी चुनाव नहीं जीत सकते। लेकिन भाजपा का टिकट मिला और मोदी के नाम पर जीत उनके खाते में आ गई। लेकिन बांकीपुर विधानसभा चुनाव के परिणाम ने इस कहावत पर सवाल खड़े कर दिये और ये अहसास करा दिया कि कोई भी अहंकार में ना रहे जनता ही सर्वोपरि है। जीत में मार्जन भी इतना हुआ है कि आसानी से उसे इधर-उधर भी नहीं किया जा सकता। बांकीपुर विधानसभा की जनता का विश्वास भी पहले राउंड से आखिर तक नहीं डगमगाया। इतना ही नहीं जन सुराज पार्टी के प्रमुख एवं उम्मीदवार प्रशांत किशोर पहले राउंड से बढ़त बनाये रहे और 31 राउंड तक जो अंतिम राउंड था एक बार भी भाजपा उम्मीदवार आगे नहीं निकले। जाहिर है कि जनता ने पहले ही किला ध्वस्त करने का मन बना लिया था। इस सीट का परिणाम उन लोगों के लिए आत्म मंथन है जो जनता को बंधुवा मजदूर समझते हैं। जय हिंद