पप्पू यादव का विरोध करने का तरीका
कल संसद भवन के बाहर जो कुछ हुआ उससे फिर एक बार राजनीति में गिरावट की तस्वीर दिखाई दी। साधू-संतों की वेशभूषा का मजाक उड़ाया गया। क्या यही राजनीति है? धार्मिक रंग को लेकर हालांकि धर्म का कोई रंग नहीं होता लेकिन फिर भगवा कलर साधू-संतों और फकीरों का होता है। खुलेआम उसका मजाक उड़ाया गया। भगवान श्रीराम के मंदिर चढ़ावे को लेकर जिस तरह की तस्वीर संसद के बाहर दिखाई दी वास्तव में वो शर्मसार करने वाली थी। आप किस तरह अपने आप को सनातनी कहते हैं। साधू-संतों की वेशभूषा में बैठकर लूटपाट की बात कर रहे हैं। इसे कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। राम मंदिर चढ़ावे को लेकर मुकदमा दर्ज हो चुका है एसआईटी बन गई है, जांच हो रही है, ऐसे मामले को सडक़ पर लाने का किसने अधिकार दे दिया। भगवान राम के मंदिर को लेकर सवाल खड़े करने वाले आज चढ़ावा चोरी को लेकर अपने आप को साधू के वेश में राजनीति कर रहे हैं। अफसोस इस बात का है कि राम की पवित्र नगरी अयोध्या के सांसद जो एक बुजुर्ग भी हैं अवधेश प्रसाद वहां पर जिस अंदाज में अपनी भूमिका निभा रहे थे वो उनको शोभा नहीं देती। जिस पवित्र नगरी से वो सांसद हैं उसका मजाक उड़ाते हुए दिखाई दिये। हालांकि राजनीति में अब धर्म की एंट्री हो चुकी है जो ठीक नहीं है। कोई भी दल हो वो राजनीति करे धर्म पर चोट ना करे। जिस तरह सांसद पप्पू यादव ने धर्म का मजाक उड़ाया है वहीं अभी हाल ही में एक बड़ी पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष के जुलूस में भी हनुमान जी की वेशभूषा में एक व्यक्ति आगे चल रहा था ये भी नहीं होना चाहिए था। राजनीति से धर्म को दूर रखना चाहिए। धर्म सर्वोपरि है और राजनीति से उसका कोई लेना-देना नहीं है। भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं। उनके नाम को इस्तेमाल करना ठीक नहीं है। कल जिस तरह संसद भवन के बाहर भगवान श्रीराम के चढ़ावे को लेकर विपक्षी सांसदों द्वारा नाटक किया गया वो केवल और केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए था। ऐसे व्यक्ति आस्था की बात कर रहे हैं जो कभी भगवान श्रीराम के दर्शन करने नहीं गये। जिनका इतिहास अपराध से भरा हुआ है लेकिन हमारे देश की विडंबना है कि वोट देते समय व्यक्ति के अतीत पर कोई ध्यान नहीं देता यही कारण है कि आज संसद में जिस तरह का माहौल है वो सभी के सामने है। बहरहाल, कल घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है। जय हिंद