एक अजीब सी सूरत बन गई है जब कोई बड़ी घटना होती है तो पुलिस प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी का पता चलता है। जबकि उनका काम हमेशा सक्रिय रहना, अलर्ट रहना, हर चीज पर नजर रखना, हर चीज की बारीकी से जांच करना, कहां पर कमियां हैं, कहां पर खामियां है, कौन सही है, कौन गलत है, कौन सक्रिय अपराध में है, कौन अब सुधर रहा है ये तमाम जिम्मेदारियां पुलिस प्रशासन की होती है। ऐसा नहीं है कि कोई घटना होने के बाद ही इस तरह की जिम्मेदारियों की याद उन्हें दिलाई जाती है। यदि समय रहते पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों को निभाएं तो संभवत: अपराधिक घटनाओं को रोका जा सकता है। अवैध निर्माण को रोका जा सकता है, अवैध कारोबार को रोका जा सकता है, ये ठीक है कि कहीं ना कहीं कुछ स्थानों पर पुलिस ही कुछ छूट देती है लेकिन सारी व्यवस्था गलत है सारी पुलिस गलत है ऐसा भी नहीं है। लेकिन एक बार नहीं कई बार देखा गया है कि जब कोई अपराधिक घटना हो जाती है तो एकदम पूरा सिस्टम सक्रिय हो जाता है। कोई बड़ी इमारत गिर जाती है और हादसा होता है तो तब ही इमारतों की जांच होती है। कहीं आग लगती है तो फायर सर्विस वाले सक्रिय हो जाते हैं वरना हर चीज का अपना एक डिपार्टमेंट है अगर सभी डिपार्टमेंट के लोग अपने काम को केवल और केवल ऑफिस में आकर ड्यूटी पूरा करने के बदले अपनी जिम्मेदारी समझेंगे तो शायद अपराधिक घटनाओं को रोका जा साकता है और हादसों को भी रोका जा सकता है। पुलिस कमिश्नरेट बनने के बाद यहां बहुत सिस्टम शुरू में बदला था। यहां पर बीट सिस्टम भी लागू किया गया था लेकिन वो सब कुछ दिन तो चला उसके बाद कहीं कुछ नहीं हुआ। बहरहाल, अब जिस तरह की घटनाएं हो रही है पुलिस प्रशासन के लोग सडक़ों पर हैं, अपराधियों से अपराध छोडऩे का संकल्प लिया जा रहा है। अवैध धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई हो रही है ये सभी पार्ट पुलिस प्रशासन के थे लेकिन पहले से कोई सक्रिय नहीं था। घटना होने के बाद अब सब सक्रिय है और इस तरह से काम हो रहा है जैसे उन्हें कोई नई जिम्मेदारी मिली हो। जबकि ये पार्ट ऑफ दा सर्विस है। उम्मीद की जानी चाहिए अब इस रफ्तार को पुलिस प्रशासन आगे भी जारी रखेंगे ताकि फिर कोई घटना हो। जय हिंद