प्रदर्शनकारियों पर एक्शन
एसएसपी मेरठ अविनाश पांडेय द्वारा सडक़ जाम कर रहे लोगों के साथ जो व्यवहार किया गया उसको लेकर अब खूब राजनीति हो रही है। राष्टï्रीय मानव अधिकार आयोग से लेकर कई संस्थाएं एसएसपी को तलब कर चुकी हैं। दरअसल, इसमें कौन गलत है, कौन सही है, ये लंबा विषय है। क्योंकि पुलिस एक अनुशासित फोर्स है और संविधान से बंधी हुई है। इसलिए उसका हर कार्य जनता की नजर में भी रहता है और उस पर बड़ी जिम्मेदारी भी है। अफसोस की बात ये है कि छोटी सी बड़ी वारदात हो या कोई भी समस्या हो हमेशा पुलिस का ही सहयोग मांगा जाता है। अगर पुलिस नहीं हो तो जंगलराज हो जाए लेकिन कई बार देखा है कि पुलिस की वर्दीधारी फाड़ी गई, सिपाहियों को पीटा गया, डिप्टी एसपी स्तर के अधिकारी की हत्या कर दी गई। भीड़ ने बुलंदशहर में इंस्पेक्टर को सडक़ पर मार दिया, तब तो कोई जातिवाद चला , ना ही इतनी रील बनी जितनी पिछले चार दिन से बन रही हैं। सडक़ जाम करने का अधिकार किसी को नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि कोई रास्ता जाम करता है तो उस पर सख्त कार्रवाई हो। हालांकि एसएसपी का जो व्यवहार रहा उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता। जब जिले का पुलिस प्रमुख ही हिरासत में लिये गये व्यक्ति को पीटेगा तो अच्छा संदेश नहीं जाएगा। लेकिन सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया जाएगा, रास्ता जाम होगा, लोग परेशान होंगे, तो आखिरकार फिर कैसे व्यवस्था चल सकती है। जातिवाद की बात करने वाले जिस तरह से एसएसपी को टारगेट कर रहे हैं वो भी किसी भी हाल में ठीक नहीं है। सरकारी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति जाति-धर्म से ऊपर उठकर होता है। लेकिन जिस-जिस नामों से एसएसपी को पुकारा जा रहा है उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता। आखिरकार ये कहां का संविधान है। एसएसपी को संविधान के दायरे में रहने वाले उस संविधान के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, जातिवाद की बात कर रहे हैं, ये कहां तक उचित है। जो भी है एसएसपी का थप्पडक़ांड जरूर चुनावी मुद्दा बनेगा। क्योंकि आज की राजनीति में ना विकास मुद्दा है ना रोजगार मुद्दा है ना बेरोजगारी मुद्दा है केवल जाति और धर्म पर राजनीति हो रही है। इससे आगे कुछ नहीं हो रहा है। जय हिंद