ब्राह्मïण समाज पर की गई अमर्यादित टिप्पणी पर यूं तो समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने माफी मांग ली है। मगर यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा है। राजकुमार भाटी ने इस मामले पर माफी मांगी तो उनकी कई अन्य वीडियो वायरल हो गईं। उन सभी वीडियो में वह अप्रत्यक्ष रूप से ब्राह्मïण समाज को ही टारगेट करते नजर आ रहे हैं। इसीलिए लोगों की नाराजगी कम नहीं हो रही है। नोएडा में बार के दो बड़े पदाधिकारी जो सपा में ही थे, उन्होंने सपा प्रवक्ता की बातों पर नाराजगी जताते हुए सपा छोडऩे का एलान कर दिया। पश्चिम के कई और जनपदों में भी सपा के ही नेता राजकुमार भाटी की बयानबाजी पर घुटन महसूस कर रहे हैं। सपा से जुड़े कई लोग सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने से नहीं चूक नहीं रहे हैं। अब बसपा प्रमुख मायावती ने सपा प्रवक्ता के बयान को लेकर अखिलेश यादव पर निशाना साधा है। मायावती ने इसे ब्राह्मïण विरोधी बताते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव से माफी मांगने को कहा है। उन्होंने सपा की इसे संकीर्ण जातिवादी राजनीति बताया है। कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि धर्म विशेष को खुश करके उनकी वोट पाने के लिए राजकुमार भाटी ऐसा कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या किसी एक धर्म को खुश करने भर के लिए दूसरे धर्म को नीचा दिखाना जरूरी है? क्या सियासी लाभ लेने के लिए सामाजिक एकता को खतरे में डालना उचित है?
मुझे तो लगता है कि सामाजिक एकता किसी भी सियासी लाभ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक है। ऐसा भी नहीं है सपा के किसी नेता ने पहली बार जातिगत आधार पर विवादित टिप्पणियां की हैं। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है। समाजवादी पार्टी के नेताओं को पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव परिणाम से सीख लेनी चाहिए। बंगाल में यही भाषा ममता बनर्जी और और उनके दल के नेताओं की थी। उसका क्या परिणाम आया है उसे सभी जानते हैं। अगले साल यूपी में चुनाव है। सपा नेताओं की भाषा संयमित ना रही तो चुनाव के परिणाम उसके लिए हितकारी नहीं होंगे।