कितनी अजीब बात है कि जिस एक समस्या को हटाने के लिए कई कई विभाग जुटे हुए हैं, वह समस्या समाप्त ही नहीं हो रही है। यातायात पुलिस, नगर निगम, जीडीए, यूपीएसआईडीसी जैसे सभी विभागों की प्राथमिकता में एक ही समस्या है। वह समस्या है अतिक्रमण की। शहर का कोई नागरिक याद करके देख ले कि उसने साल भर में कुल कितनी बार यह खबर पढ़ी कि अमुक विभाग ने अतिक्रमण के खिलाफ बिगुल बजा दिया है। क्या हमारे पाठक नहीं जानते कि एक महीने में कितनी बार नगर निगम अतिक्रमण के खिलाफ अभियान शुरू करता है? खुद महापौर तो अब तक ना जाने कितने करोड़ों की नगर निगम की जमीन खाली करा चुकी हैं। नगर निगम के अधिकारी कभी इस बाजार, तो कभी उस बाजार, कभी इस मौहल्ले, तो कभी उस मौहल्ले अतिक्रमण हटाते ही रहते हैं। अतिक्रमण हटाने के मामले में जीडीए भी पीछे नहीं है। जीडीए का भी बुलडोजर कहीं ना कहीं चलता ही रहता है। औद्योगिक क्षेत्रों में यूपीएसआईडीसी के अतिक्रमण विरोधी अभियान चलते ही रहते हैं। लेकिन आपको गाजियाबाद का कोई औद्योगिक क्षेत्र ऐसा नहीं मिलेगा जहां की एक भी सडक़ भी अतिक्रमणमुक्त हो। गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के यातायात विभाग की तो पूछो ही मत। ऐसा कोई चौराहा नहीं होगा गाजियाबाद में जहां यातायात विभाग के कर्मी तैनात नहीं रहते हों और ऐसा भी कोई चौराहा नहीं होगा, जहां सडक़ पर अतिक्रमण ना हो, फटपाथ पर कब्जा ना हो। पुलिसकर्मियों के सामने ही ढेली वाले, ई रिक्शा, ऑटो वाले यातायात को बाधित करते रहते हैं, मगर मजाल कि कोई कुछ कार्रवाई कर दे। आप कुछ देर किसी सडक़ पर खउ़े हो जाइए, कितने ही ऑटो ऐसे निकलेंगे जिनमें तेज म्यूजिक बजता रहता है। गाजियाबाद नगर निगम की तो एक और बात बहुत बढिय़ा है कि हर महीने शहर की सडक़ों को गड्ढामुक्त करने का अभियान चलाने की बात कही जाती है। योजनाएं बनतीं हैं, घोषणाएं होतीं हैं। मगर सडक़ों का दोष देखिए कि वहां से गड्ढे दूर होती ही नहीं।