घटना किसी प्रकार की भी हो जाए पुलिस पर दोष मढऩा बड़ा आसान हो जाता है। बात कोई हो हम पुलिस को बड़ी जल्दी ब्लेम कर देते हैं। लेकिन हम लोग खुद सुधरने को तैयार नहीं हैं। मेरा मतलब यह कतई नहीं है कि पुलिस बिलकुल पाक साफ है। मैं यह भी नहीं कह रहा पुलिस किसी का उत्पीडऩ नहीं करती। मगर जब बात सडक़ पर चलने की और यातायात के नियमों का पालन करने की आती है, तो लोगों की गलती साफ नजर आती है। कल ही की एक घटना आपके सामने रखता हूं। मैं शास्त्रीनगर की तरफ जा रहा था। एक स्कूटी पर एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अपने पीछे दो छोटे स्कूली बच्चों को बिठा कर ले जा रहा था। पहली बात उन सज्जन ने रेड लाइट जंप की। वह रेड लाइट पर रुके नहीं, बड़ा खतरा उठाते हुए यातायात के बीच से निकले। फिर कुछ दूर तक रांग साइड चले। इस दौरान भी कई गाडिय़ों से बाल बाल बचे। उसके बाद अपनी साइड आए तो सडक़ के बीचों बीच चलने लगे। पीछे से आ रही गाडिय़ां हॉर्न देती रहीं। इस दौरान बच्चे भी भयभीत नजर आ रहे थे, परंतु वह हताश और निराश थे। लोग हैरानी जता रहे थे और उस व्यक्ति पर कोई असर ही नहीं था। वह ऐसे जा रहा था जो कोई विजय प्राप्त करके आया हो। यह कोई अकेली घटना नहीं है। आप शहर के किसी चौराहे पर खड़े हो जाइए, कितने ही वाहन ऐसे मिलेंगे जो रेड लाइट पर रुकना अपनी तौहीन समझते हैं। बाइक पर तीन से चार लोग चलते हुए भी आपको हर दो से तीन किलोमीटर पर दिख जाएंगे। हेलमेट पहनने और सीट बेल्ट लगाने में भी लोगों की कोई इच्छा नहीं होती। काली फिल्म लगी कितनी ही गाडिय़ां सडक़ों पर रोज नजर आती हैं। सरकार से लेकर अदालत तक बढ़ती सडक़ दुर्घटनाओं पर चिंता जता चुकी हैं। मगर क्या सडक़ दुर्घटना केवल पुलिस ही रोक सकती है। उन लोगों का क्या हो जो सडक़ के नियमों का उल्लंघन करते रहते हैं। अब तो नया फैशन चल गया है वाहन की नंबर प्लेट को प्रभावित करके चलने का।