कहां कर सकते हैं मुकाबला

महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर एकबार फिर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष को जोर का झटका धीरे से दिया। दरअसल, विपक्ष जहां से सोचना बंद करता है वहां से फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सोचना शुरू करते हैं। दोनों की जोड़ी जब कोई नया ऐलान करती है तो सब चौंकन्ने रहते हैं। अमेरिकी-ईरान युद्घ को लेकर देश में गैस की किल्लत, पेट्रोल की किल्लत, महंगाई की चर्चाएं चल रही थी। भारत की खामोशी पर सवाल उठ रहे थे। लोकसभा में भी भारत को लेकर विपक्ष हमलावर था लेकिन इस बीच महिला आरक्षण बिल लाकर सत्ता पक्ष ने विपक्ष को दूसरे मुद्दे में उलझा दिया। ये मुद्दा भी ऐसा है कि विपक्ष के लिए ये गरम दूध बन गया है। इसे ना उगल सकते हैं और ना पी सकते हैं और सत्ता पक्ष अपने मकसद में कामयाब हो गया। महंगाई, युद्घ सब मुद्दे ठंडे हो गये। सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक केवल आधी आबादी की चर्चा होने लगी। विपक्ष चीख-चीखकर कहने लगा कि हम महिला आरक्षण बिल के खिलाफ नहीं है परिसीमन के खिलाफ है। दरअसल, विपक्ष चाहता है कि २०२६ की जनगणना के हिसाब से आरक्षण मिले जबकि सत्ता पक्ष २०११ की जनगणना के आधार पर ये आरक्षण बिल लाया था उसके आधार पर लोकसभा की ८१६ सीटें बन रही थी। अब तक जो ५४३ सीटें हैं वो १९७१ की जनगणना के आधार चली आ रही है। दरअसल, सत्ता पक्ष २०११ की जनगणना के आधार पर इसलिए आरक्षण चाह रहा था ताकि फिर २०२९ के लोकसभा चुनाव में इसका लाभ मिल सके। अगर २०२६ की जनगणना के आधार पर यदि आरक्षण की बात होगी तो उसका लाभ २०३० में मिलेगा। इसलिए जल्दबाजी में २०२९ के चक्कर में २०११ की जनगणना के आधार पर ये बिल लाया गया था। विपक्ष भी कहीं ना कहीं सही था कि अगर आरक्षण देना ही है तो २०२६ की जनगणना के आधार पर दिया जाए। बहरहाल, बिल गिर गया है लेकिन अगर विपक्ष खुलकर विरोध करता तो फिर उसके लिए आगे की राहें आसान नहीं होती। लेकिन अब भी भाजपा को इसका लाभ जरूर मिलेगा क्योंकि वो इसे चुनावी मुद्दा जरूर बनाएंगे और आधी आबादी को ये समझाने का प्रयास करेंगे कि विपक्ष उनके खिलाफ है।
दरअसल, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं और ऐसे में महिला आरक्षण बिल लाकर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। चाहे विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा का चुनाव हो भाजपा कोई ऐसा तीर चलती है जिससे विपक्ष धराशाही हो जाता है। महिला आरक्षण बिल का असर पश्चिम बंगाल के चुनाव पर निश्चित रूप से पड़ेगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, भारतीय जनता पार्टी कब क्या नया ले आये कुछ कहा नहीं जा सकता। 2027 से पहले यूपी में कुछ नया हो जाए इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता और 2029 से पहले देश में कुछ नया हो जाए इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जहां से विपक्ष सोचना बंद करता है वहां फिर शाह और मोदी सोचना शुरू करते हैं और वो अपना रास्ता खुद बना लेते हैं दोनों महारथियों पर ये शेर पूरी तरह फिट बैठता है।
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा। जय हिंद