३० मई हिंदी पत्रकारिता दिवस
३० मई यानि आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। आज ही के दिन पहला हिंदी अखबार निकला था। दशकों बाद पत्रकारिकता की ये स्थिति होगी किसी ने सोचा भी नहीं था। हम आधुनिकता के दौर में शामिल हो गये। हिंदी पत्रकारिता के बाद डिजिटल पत्रकारिता में क्रांतिकारी बदलाव आया। कलम और स्याही की जगह कंप्यूटर ने ले ली। झोला और कुर्ता पहनकर पत्रकार की शुरूआत हुई थी। आज इतनी क्रांति आयी है कि पत्रकार की वेशभूषा ही नहीं बदली उसकी कलम की रफ्तार भी बदल गई है। अब कलम इशारों पर नाचती है। आज कलम पर बैन है। सत्ता के साथ-साथ अखबार के मार्केटिंग के डिपार्टमेंट का भी बैन है। किसी बड़े आदमी के खिलाफ, किसी बिल्डर के खिलाफ, किसी नेता के खिलाफ कलम चलाने से पहले मार्केटिंग डिपार्टमेंट से मालूम करना पड़ता है कि ये हमारी ऐड पार्टी तो नहीं है। देश के नामचीन पत्रकार अपने कलम चलाने की सजा भुगत रहे हैं। वो सब घर बैठा दिये गये हैं। सोशल मीडिया के सहारे परिवार पाल रहे हैं। ये है पत्रकारिता दिवस की असली पहचान। हर दौर में कहीं ना कहीं कलम पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया जाता रहा है। बड़े-बड़े मीडिया घराने रातोंरात बंद करा दिये जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि ये सबकुछ एक दशक से हो रहा है, कई दशक पहले भी इस तरह की तस्वीरें सामने आयी है लेकिन आज कुछ ज्यादा ही तस्वीर बदल चुकी है। क्योंकि अब सबकी अपनी-अपनी मजबूरियां हैं। अब सबको दूसरे की शर्ट ज्यादा सफेद लगने लगी है। अपनी शर्ट भी सफेद रहे इसके प्रयास में सब लग गये हैं। जो पत्रकारिता कभी मिशन थी आज व्यवसायी बन गई है। ठीक है क्रांतिकारी परिवर्तन आया है लेकिन जो गिरावट आयी है उसे भी स्वीकार करना पड़ेगा। राजनीति करने वाले लोगों से जनता सवाल करती थी लेकिन आज मीडिया की छवि भी पहले जैसी नहीं रही है। अब खुलेआम तौर पर कहते हैं कि मीडिया भी बिक गया। हालांकि कुछ लोग आज भी अपने उसूलों से समझौता नहीं करते लेकिन ऐसे लोगों की संख्या नाममात्र ही है।
लोकतंत्र के चार स्तंभ न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता। आज ये स्तंभ हिल रहे है। हर स्तंभ पर कहीं ना कहीं सवाल खड़े होने लगे हैं। इसलिए आज हिंदी पत्रकारिता दिवस पर ये संकल्प लिया जाए कि हम कलम का सौदा कभी नहीं करेंगे। सत्ता की चौखट पर नहीं झुकेंगे, जनता की आवाज बनेंगे यही पत्रकारिता दिवस की सच्ची शुभकामनाएं होंगी।
जय हिंद