बुधवार के युग करवट के अंक में इसी कॉलम में मैने सरकारी स्कूलों की बदहाली पर लिखा था। इस पर अनेक लोगों ने प्रतिक्रिया दी है। मगर सबसे सटीक प्रतिक्रिया यह आई कि सरकारी प्राथमिक स्कूलों में किसान, मजदूर, अल्प आय वर्ग के लोगों के बच्चे पढ़ते हैं। नेताओं, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों के बच्चे तो कान्वेंट स्कूलों में पढ़ते हैं। गरीब, किसान और मजदूर महंगी किताबें, युनिफार्म, एसी बसों को खर्च वहन कर ही नहीं सकता। जब नेताओं के जनप्रतिनिधियों के और अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे ही नहीं तो उनकी सुध भला कोई क्यों लेने लगा। यह टिप्पणी राजनगर एक्सटेंशन में रहने वाले फ्लैट ओनर्स एसोसिएशन राजनगर एक्सटेंशन के अध्यक्ष राजकुमार त्यागी ने दी थी। उनका कहना था कि सभी स्कूलों में किताबें वहीं हैं, शिक्षा व्यवस्था भी वही है। फिर भी प्राइवेट और स्कूलों में सुविधाओं और माहौल का बड़ा फर्क है। ऐसे में सरकारी स्कूलों की व्यवस्था में सुधार की उम्मीद करना बेमाईमानी ही होगी। शिक्षा के मंदिरों को सुधारने से पहले हमें समाज की सोच में बदलाव लाना होगा। अब देखा जाए तो राजकुमार त्यागी की बातों में तनिक भी गलती नहीं है। जिन सरकारी स्कूलों में हम उच्चस्तरीय सुविधाएं और माहौल चाहते हैं, वहां तक वह लोग तो पहुंचते ही नहीं हैं जिनके हाथ में बदलाव है। जहां तक नेताओं और जनप्रतिनिधियों का सवाल है तो उनका नजरिया दूसरा ही है। सत्ता अब औपचारिकता में ज्यादा विश्वास रखती है। दिखावा चलन में ज्यादा आ गया है। अब तो अगर कोई सामाजिक संगठन भी किसी स्कूल में कुछ दे आए तो एक वस्तु के पीछे दर्जनों हाथ दिखाई देते हैं। मैं तो कहता हूं कोई बात नहीं खिंचवाइए खूब फोटो, खूब समाचार पत्रों में प्रकाशित कराइए, मगर कम से कम स्कूलों को एक बेहतर माहौल बनाकर तो दीजिए। ये औपचारिकता का मामला खत्म होना चाहिए। मगर शायद यह तभी हो पाएगा जब नेता, जनप्रतिनिधि और अधिकार अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही पढ़ाएं। इससे उन्हें वास्तविकता का भी पता चलेगा और शायद कुछ करने की गुंजाइश भी पैदा होगी।