त्योहारों का सीजन आते ही बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और हर तरफ रंग-बिरंगी मिठाइयां सजने लगती हैं। लेकिन इस मिठास के पीछे छिपा मिलावट और गंदगी का काला सच बेहद खौफनाक है। चांदी के वर्क के नाम पर एल्युमिनियम, मावे में डिटर्जेंट और यूरिया, और रंगों के नाम पर कैंसर पैदा करने वाले केमिकल का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इसके साथ ही जिन कारखानों में ये मिठाइयां बनाई जाती हैं, वहां की गंदगी देखकर किसी का भी जी मिचला जाए। यह सिर्फ एक व्यापारिक धोखाधड़ी नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर जनता के स्वास्थ्य और उनकी जान से खिलवाड़ है। ऐसी दूषित मिठाइयों को खाकर लोग पेट की बीमारियों से लेकर कैंसर और किडनी खराब होने जैसी गंभीर समस्याओं का शिकार हो रहे हैं। विडंबना यह है कि हर साल स्वास्थ्य विभाग त्योहारों के समय कुछ जगहों पर छापेमारी करता है, कुछ सैंपल लिए जाते हैं, और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। ढुलमुल रवैये और नाममात्र के जुर्माने के कारण इन मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं। अब समय आ गया है कि इन चंद पैसों के लिए लोगों की जिंदगी दांव पर लगाने वाले अपराधियों पर बेहद कठोर कार्रवाई की जाए। सिर्फ जुर्माना लगाना काफी नहीं है, बल्कि ऐसे मिलावटखोरों की दुकानों को तुरंत सील कर उन्हें गैर-जमानती धाराओं के तहत जेल भेजा जाना चाहिए। इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा विभाग को केवल त्योहारों पर ही नहीं, बल्कि सालभर सक्रिय रहना होगा। जब तक सख्त कानून और त्वरित न्याय की व्यवस्था नहीं होगी तब तक हमारी थाली में यह धीमा जहर परोसा जाता रहेगा। जनता की सेहत सर्वोपरि है और इससे समझौता करने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। आप हाल-फिलहाल किसी भी दिन को कोई भी समाचार पत्र उठाकर देख लीजिए, आपको किसी ना किसी शहर में किसी मिठाई की दुकान या कारखाने पर छापेमारी की खबर मिल ही जाएगी। अब तक सैंकड़ों किलोग्राम मिठाई नष्टï भी की चुकी है। मेरा यह मानना है कि ऐसे किसी भी मामले में कठोर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि कोई ऐसा करने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर हो जाए।