भाजपा अपने अधिकतर मोर्चे और कार्यकारिणी घोषित कर चुकी है। पिछले कुछ दिनों से भाजपा के लोगों के बीच बैठो तो एक सवाल अक्सर सामने आ जाता है। इस सवाल में पूछा जाता है कि क्यों ना भाजपा में अन्य मोर्चों के साथ एक नया मोर्चा, पत्नी मोर्चा के नाम से भी बना दिया जाए? भाजपा में युवा मोर्चा, महिला मोर्चा, अनुसूचित मोर्चा, ओबीसी मोर्चा, किसान मोर्चा, सूची इतनी लंबी है कि आम कार्यकर्ता कन्फ्यूज हो जाए कि झंडा किसका उठाना है। लेकिन हाल ही में राजनीति के गलियारों में चाय की चुस्कियों के बीच एक बिल्कुल नई और क्रांतिकारी मांग उठी है। इस मांग के पीछे कोई राजनीतिक विद्वेष नहीं, बल्कि शुद्ध पारिवारिक और रणनीतिक मजबूरी छिपी है। क्योंकि गाजियाबाद की भाजपा में पत्नी को पद दिलाने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ती जा रही है। खुद को कुछ नहीं मिल रहा है तो पत्नी को ही राजनीति में कुछ हासिल हो जाए, ऐसी मनोधारणा बढ़ती जा रही है। ऐसे में पत्नी मोर्चा का गठन बड़ा काम करेगा। क्योंकि पत्नी मोर्चा में नेताओं की गृहलक्ष्मी पद पा लेगीं, और सामान्य कार्यकर्ता का अधिकार बचा रहेगा। क्योंकि अब ज्यादातर कार्यकर्ता जानते हैं कि नेता जो को कुछ नहीं मिला तो वह पत्नी के लिए कुछ ले आएंगे और वह खाली हाथ ही रह जाएंगे। देखने में आता है कि अक्सर पद अथवा टिकट न मिलने पर नेता बगावत कर देते हैं। पत्नी मोर्चा के होते ऐसा नहीं हो पाएगा। पत्नी मोर्चा के आने के बाद टिकट वितरण का काम और पारदर्शी हो जाएगा। केंद्रीय नेतृत्व को सर्वे कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मोर्चा सीधे रिपोर्ट कार्ड देगा कि जो व्यक्ति घर में शांति और अनुशासन नहीं रख सकता, उसे विधानसभा या लोकसभा का टिकट कैसे दिया जाए? इस मोर्चे की एनओसी के बिना टिकट मिलना नामुमकिन हो जाएगा। अब तक धरने-प्रदर्शनों में पुरुष कार्यकर्ता या महिला मोर्चा की कार्यकर्ता दिखती हैं। सोचिए, जब पत्नी मोर्चा सडक़ पर उतरेगा, तो पुलिस भी पानी की बौछार करने से पहले सौ बार सोचेगी। बेलन और चिमटे के प्रतीकात्मक प्रदर्शन के सामने तो बड़े से बड़ा प्रशासन नतमस्तक हो जाएगा। गाजियाबाद के ट्रैफिक जाम की समस्या तो यह मोर्चा चुटकियों में सुलझा देगा बस एक बार घोषणा करने की देर होगी कुल मिलाकर भाजपा में पत्नी मोर्चा की मांग भले ही मजाकिया लहजे में उठी हो, लेकिन यह राजनीति में पारिवारिक संतुलन लाने का एक शानदार आइडिया साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि जिले के आला नेता इस मांग को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने की हिम्मत जुटा पाते हैं या फिर घर पर अनुशासनिक कार्रवाई के डर से इस फाइल को दबा देते हैं। या फिर शीर्ष नेतृत्व से पत्नी मोर्चा का गठन कराकर अपने लिए नया रास्ता तलाश कर लेंगे।