राज्यसभा चुनाव
भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी पार्टी है जिसकी सोच को समझना हर किसी के बस की बात नहीं है। आज की भाजपा और दो दशक पहले की भाजपा में जमीन आसमान का अंतर है। पहले विचार होता था, मंथन होता था, तब चर्चाएं बाहर आती थी और वो खबरें बन जाती थी। आज चर्चाएं तो बाहर आती है लेकिन वो चर्चाओं तक ही सीमित रहती हैं। तभी तो किसी ने कहा कि जहां लोगों की सोच खत्म हो जाती है वहां से भाजपा हाईकमान सोचना शुरू करता है। एक सप्ताह से अधिक समय से मीडिया में राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर खूब खबरें छप रही थी। भाजपा समर्थित कुछ अखबारों में भी उम्मीदवारों के नाम छपे थे लेकिन जो लिस्ट आयी उसने सबको चौंका दिया। लिस्ट में जो नाम थे उसमें केवल दो ही नाम थे बाकी सब नाम नये थे और ऐसे नाम थे जो कहीं चर्चा में भी नहीं थे। गाजियाबाद के प्रभारी मंत्री धर्मपाल सिंह का नाम चर्चा में नहीं था। गाजियाबाद लंबे समय पहले रहे संगठन मंत्री प्रकाशपाल का भी कहीं जिक्र नहीं था। चर्चा थी अंतर्राष्टï्रीय कवि कुमार विश्वास की, चर्चा थी सतपाल चौधरी की, संजीव बालियान की, जयंत चौधरी की और कई नामों की लेकिन सब नाम चर्चाओं तक ही सीमित रहे और ऐसे नाम आये जो चर्चा में भी नहीं था। राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों की सूची के बाद अब विधानसभा चुनाव में जो टिकट के दावेदार हैं उनकी चिंता भी बढ़ गई है। दावेदारों को या मौजूदा विधायकों को इस बात का अहसास था कि पार्टी उन्हें जरूर मौका देगी। लेकिन राज्यसभा उम्मीदवारों के बाद ऐसा होगा ये विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता क्योंकि राज्यसभा उम्मीदवारों की लिस्ट में भी भाजपा हाईकमान ने किसी की भी नाराजगी की कोई परवाह नहीं की और जो उन्हें सही लगा वो किया। आज की स्थिति ये है कि भाजपा को हर हाल में ऐसे लोगों की जरूरत है जो उसकी सत्ता बचाए रखे। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में २०१७ से लेकर और फिर २०२२ तक जो विधायक रिपीट हुए हैं उनकी स्थिति सर्वे में ठीक नहीं आयी है इसलिए भाजपा हाईकमान कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं और विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों के चयन में भी भाजपा बहुत ही सोच समझकर निर्णय लेगी और उम्मीदवारों की सूची में ऐसे नाम जरूर होंगे जो संभवत: पहली बार चुनाव लड़ेंगे और ये सूची भी जरूर चौंकाने वाली होगी। क्योंकि भाजपा हाईकमान के निर्णय २०१४ के बाद चौंकाने वाले ही रहे हैं। जय हिंद