भारतीय जनता पार्टी में अधिकतर पदों पर नियुक्ति हो चुकी है। महानगर, जिला, क्षेत्र और प्रदेश की कार्यकारिणी घोषित की जा चुकी हैं। मैं गाजियाबाद के नजरिए से बात करुं तो कुछ लोग महत्वपूर्ण पद हासिल करने में कामयाब रहे हैं। मगर अभी भी बहुत से ऐसे हैं जो पार्टी की ओर बड़ी हसरत भरी नजरों से देख रहे हैं। ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो पहले महानगर की टीम में एडजस्ट होने को हाथ पैर मार रहे थे। महानगर कमेटी में हाथ खाली रह गए तो क्षेत्रीय कमेटी के लिए भाग दौड़ शुरू कर दी, मगर निराशा ने यहां भी साथ नहीं छोड़ा। प्रदेश की टीम में उन लोगों को कोई खास दिलचस्पी थी नहीं। ऐसे बहुत से लोग अब किसान मोर्चा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा आदि में भी जाने को तैयार हैं। अब इन लोगों ने अपनी सिफारिश किसी मोर्चे में करनी प्रारंभ कर दी हैं। बड़ा सवाल मेरे मन में यह है कि ऐसे सभी लोगों को तो पद मिलना अभी भी संभव नहीं है। अब भी जिन लोगों को कहीं पद नहीं मिलेगा वह करेंगे क्या? बहुत से लोगों का मानना होता है कि जब एक या इससे बार पार्टी में किसी पद पर रह चुके हैं तो अब बिना संगठन में जिम्मेदारी के कैसे चल पाएंगे। वैसे भी हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में तरक्की की चाहत रखता ही है। लोग वार्ड से राजनीति की शुरूआत करते हैं। उसके बाद मंडल में फिर महानगर में, उसके बाद क्षेत्र में और फिर प्रदेश में जाना चाहते हैं। मगर बात महानगर से आगे ही ना बढ़े तो कोई भला कैसे प्रदेश तक पहुंचेगा। गाजियाबाद में तो एक नहीं कई उदाहरण हैं कि अबसे बहुत पहले प्रदेश और राष्टï्रीय स्तर तक पद पा चुके हैं, फिर किसी मोर्चे में ही क्यों ना सही। कई तो भाजपा से तब विधायक रह गए जब गिने चुने कार्यकर्ता रहा करते थे। मगर आज उनको निष्क्रिय मान लिया जाता है। ऐसे ही एमएलसी स्नातक का टिकट घोषित होने में देरी हुई तो लोगों ने अंदाजा कहना शुरू कर दिया था कि उनको टिकट नहीं मिल रहा है। टिकट घोषित होने के बाद ही लोगों की जिज्ञासा शांत हो सकी थी। यह उदाहरण इसलिए दिया कि भाजपा में लोग बहुत जल्दी परिणाम पर पहुंचना चाहने लगते हैं।