हिंदी दिवस पर हिंदी भवन में हुआ कार्यक्रम
गाजियाबाद (युग करवट)। हिंदी भवन समिति की ओर से हर साल की तरह इस बार भी हिंदी दिवस पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें जहां सम्मेलन हुआ वहीं छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों का सम्मान भी हुआ। हिंदी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम अपने आप में कई बड़े संदेश छोडक़र गया। वास्तव में कवि और शायर और बुद्घिजीवी अपने आप में बड़े संदेश देते हैं। कल कार्यक्रम में हिंदी भवन समिति के महासचिव सुभाष गर्ग ने अपने संबोधन में बहुत बड़ा संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि हम हिंदी को लेकर गंभीर नहीं हैं। उन्होंने कवियों से अनुरोध किया कि वे अपने काव्य पाठक में हिंदी भाषा को लेकर जरूर अपनी जिम्मेदारी निभाएं। सुभाष गर्ग की बात को सभी ने बहुत ही गंभीरता से लिया और उनके संबोधन की सराहना की। कार्यक्रम में पीजीडीएवी कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरीश अरोड़ा जो कार्यक्रम में मुख्य वक्ता थे हिंदी को लेकर उन्होंने जिस तरह से संबोधन किया उसकी सभी ने सराहना की। उनका कहना है कि भारत एक ऐसा देश है जिसमें भाषा को लेकर संविधान में कोई जिक्र नहीं है। उन्होंने कहा कि आज हिंदी अपने ही देश में वो स्थिति नहीं रखती जिसकी वो हकदार है।
उन्होंने कहा कि हिंदी बहुत ही सरल भाषा है लेकिन आज की दुनिया में और खासकर भारत में हिंदी पर जितना काम होना चाहिए था उतना नहीं हुआ। उनका कहना था कि भारत में आज तक ये ही नहीं पता कि निमंत्रण किसे कहते हैं और आमंत्रण का क्या मतलब है। कल के कवि सम्मेलन में पुलिस उपायुक्त नगर जोन धवल जायसवाल ने भी हिंदी को लेकर कहा कि अगर हम हिंदी को रोजगार से जोड़ेंगे तो फिर हिंदी अपने आप में एक मजबूत स्थिति में होगी। धवल जायसवाल दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के असिस्टेंट प्रोफेसर रह चुके हैं और उन्होंने हिंदी पर बहुत ही अच्छे तरीके से अपने विचार रखे। कल का कवि सम्मेलन अंतर्राष्टï्रीय मंचों पर अलग छाप रखने वाले परवीन शुक्ल ने पूरी तरह से लूट लिया। उन्होंने मां पर जो कविता सुनाई और जिस समय वो कविता सुना रहे थे जहां वो कई बार खुद भावुक हुए वहीं पूरे सभागार में बैठे अधिकतर लोगों की आंखे नम थी। आठ साल में उन्होंने मां पर लिखी गई इस कविता को अंतिम रूप दिया और सभी तालियों से उनका स्वागत किया। कल के कार्यक्रम में अंजू जैन ने बहुत ही अच्छे अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने हाल ही में जंतर-मंतर पर जेनजी द्वारा जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया उसको उन्होंने शब्दों के जरिये बयां किया और बच्चों के साथ-साथ ऐसी भाषा के लिए अभिभावकों को भी जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि मैं बच्चों से ज्यादा अभिभावकों को जिम्मेदार मानती हूं क्योंकि उन्होंने ऐसे संस्कार ही नहीं दिये होंगे जिसको बच्चे सही तरीके से अपने जीवन में उतारते होंगे। उन्होंने कहा कि आज जरूरत ये है कि हम अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें तो फिर कोई भी जंतर-मंतर पर ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करेगा। विस्तृत समाचार एवं फोटो पृष्ठ तीन पर देखें।