भारत बड़े देश में सरकार हर दूर-दराज के गांव तक नहीं पहुंच सकती। जहां सरकारी तंत्र की सीमाएं खत्म होती हैं, वहां से मिशनरी स्कूलों, चैरिटेबल अस्पतालों और स्वयंसेवी संस्थाओं का काम शुरू होता है। लेकिन पिछले कुछ सालों में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम के नियमों में जो बदलाव हुए हैं, उन्होंने इन सेवाभावी संस्थानों की रीढ़ तोडक़र रख दी है। आज देश का शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र एक अनकहे वित्तीय संकट से जूझ रहा है। नियमों की सख्ती का सबसे पहला और सीधा हमला देश के चैरिटेबल अस्पतालों पर हुआ है। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में चल रहे कई बड़े अस्पताल पूरी तरह विदेशी अनुदान या प्रवासी भारतीयों की मदद पर निर्भर हैं। एफसीआरए लाइसेंस के नवीनीकरण में देरी या उनके अचानक रद्द होने से इन अस्पतालों का विदेशी फंड पूरी तरह रुक गया है। नतीजा यह है कि गरीबों को मिलने वाली मुफ्त दवाएं, रियायती इलाज और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की खरीद बेहद सीमित हो गई है। कुपोषण और मातृ स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषयों पर जमीनी स्तर पर चलने वाले कई बड़े प्रोजेक्ट्स अब ठप पड़े हैं।
यही हाल हमारी शिक्षा व्यवस्था का भी है। देश के पिछड़े इलाकों में वंचित और गरीब बच्चों को मुफ्त या नाममात्र की फीस पर शिक्षा देने वाले स्कूलों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। विदेशी सहायता बंद होने से इन स्कूलों के लिए न केवल अपने शिक्षकों को समय पर वेतन देना मुश्किल हो रहा है, बल्कि बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन जैसी बुनियादी जरूरतें जुटाना भी एक चुनौती बन गया है। उच्च शिक्षा और मेडिकल कॉलेजों में चल रहे कई महत्वपूर्ण शोध प्रोजेक्ट्स फंड की कमी के कारण बीच में ही लटक गए हैं। नए नियमों के तहत प्रशासनिक खर्चों की सीमा को 50 प्रतिशत से घटाकर सीधे 20 प्रतिशत कर देना और केवल नई दिल्ली की एसबीआई शाखा में ही एफसीआरए खाता खोलने की अनिवार्यता ने कागजी कार्रवाई का बोझ रूप से बढ़ा दिया है। अब इन संस्थानों के प्रबंधकों का आधा समय मरीजों के इलाज या बच्चों की पढ़ाई में नहीं, बल्कि दिल्ली के चक्कर काटने और कानूनी पेचीदगियों को सुलझाने में बीत रहा है। वैश्विक स्तर पर भी इसका एक नकारात्मक संदेश गया है। अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और बड़े मेडिकल रिसर्च फाउंडेशन अब भारत के संस्थानों को फंडिंग देने से कतराने लगे हैं। उन्हें डर है कि नियमों की इस उलझन में उनका पैसा कहीं अटक न जाए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि राष्ट्र की सुरक्षा और विदेशी धन की पारदर्शिता के लिए सख्त निगरानी जरूरी है। लेकिन निगरानी और नियंत्रण के बीच एक बारीक रेखा होती है। जब कानून की कड़ाई इतनी बढ़ जाए कि वह सेवा के मूल उद्देश्य को ही खत्म करने लगे तो उस पर पुनर्विचार की जरूरत होती है। अगर समय रहते इन नियमों में व्यावहारिक ढील नहीं दी गई, तो देश के ग्रामीण इलाकों का स्वास्थ्य और शिक्षा ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा, जिसकी सबसे बड़ी कीमत इस देश के गरीब और लाचार नागरिकों को चुकानी पड़ेगी।