अगर कोई यह चाहे कि वह गाजियाबाद के किसी एथलीट को राष्ट्रीय या अंतर्राष्टï्रीय स्तर पर पदक जीतते हुए देखना चाहता है, तो एक बात समझ लीजिए कि आपका यह सपना सच नहीं हो सकता। हम अभी एशियन गेम्स या ओलंपिक में भाग लेने लायक एथलीट बना ही नहीं रहे हैं। आप खिलाडिय़ों की बात करें तो ले दे कर मनोज प्रभाकर से लेकर सुरेश रैना पर आकर बात खत्म हो जाती है। क्योंकि क्रिकेट के लिए तो बहुत सी सुविधाएं हैं, मगर बाकी खेलों के लिए क्या किया जाए। अब यह मत सोचने लग जाना कि गाजियाबाद के एथलीट्स में प्रतिभा नहीं है। प्रतिभा तो यहां कूट कूट कर भरी है। बस गाजियाबाद के एथलीट्स के पास उस स्तर पर अभ्यास करने के लिए ना वातावरण है, ना उपकरण हैं और ना कोई सुविधा है। आप गाजियाबाद में स्टेडियम देखिए, पहला महामाया स्टेडियम है, जहां डिस्कस थ्रो, हेमर, हाई जंप, लांग जंप, ट्रैक, जैकलीन आदि की कोई सुविधा नहीं है। दूसरा नेहरू स्टेडियम है, यहां केवल क्रिकेट को ही खेल माना जाता है। शास्त्रीनगर का स्टेडियम हॉकी के लिए था, मगर लंबे समय से वहां हॉकी खेली ही नहीं गई है, तो हम हॉकी का खिलाड़ी पैदा कैसे कर सकते हैं। गाजियाबाद के नेता भी बड़े अजीब हैं। नेता सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के उनकी कार्यप्रणाली लगभग समान ही है। महामाया स्टेडियम में एथलीट्स लंबे सयम से सुविधाओं और उपकरणों की मांग कर रहे हैं। गाजियाबाद के किसी विधायक या मंत्री को एथलीट्स की समस्या से उनकी मांगों से कोई लेना देना नहीं है। सांसद खेल महोत्सव तो किए जाते हैं, मगर गाजियाबाद के सांसद खेल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए प्रदेश या केन्द्र सरकार के खेल मंत्री से कोई पत्राचार नहीं करते। सबसे हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि सपा हो या कांग्र्रेस किसी विपक्षी दल को भी खिलाडिय़ों की समस्या समझ में नहीं आ रही है। विधानसभा का चुनाव लडऩे की इच्छा पाले बैठे सपा, कांग्रेस आदि दलों के नेता खेल के मामले को लेकर आंखें और जुबान दोनों बंद किए बैठे हैं। गाजियाबाद के एथलीट्स को इतना ही कहना चाहुंगा कि आप भगवान से प्रार्थना करते रहिए शायद वहां कोई सुनवाई हो जाए। गाजियाबाद के नेताओं से तो कोई उम्मीद रखियेगा मत।