तीन दिन पहले तक आ रहीं खबरों पर ध्यान दें, क्या दिखाया जा रहा था कि दिल्ली-एनसीआर में आकर मानसून रूठ गया है। इतने साल बाद जून सूखा गया है। जुलाई में बारिश के कम होने की आशंका है। लोग भी कह रहे थे कि बारिश न जाने कहां चली गई है, मारे गर्मी के बुरा हाल है, अब तो बरसात हो जानी चाहिए। अब हाल देखिए एक दिन की बरसात से सब हलकान हैं। लोग अपने-अपने मुहल्ले, अपनी-अपनी गली, अपनी सोसायटी की फोटो और वीडियो पोस्ट करके प्रशासन को कोस रहे थे। हर तरफ से बारिश के आ चुकी आफत के ही चर्चे थे। अरे भाई अब खेत खलिहान तो हमारे आसपास हैं नहीं, जो बरसात का पानी वहां बह जाएगा। चारों तरफ कंकरीट का जंगल ही है। पानी निकासी गाजियाबाद, दिल्ली या नोएडा ही नहीं पूरे देश बल्कि पूरी दुनिया की परेशानी बन चुकी है। अच्छा बताइए तो नाले अगर चोक होते हैं तो किसकी वजह से होते हैं? क्या नगर निगम, जीडीए या प्रशासन नालों में पॉलिथिन डालता है? क्या नगर निगम सीवर अथवा नालों में गोबर बहाता है। पानी की बोतले, पाउच आदि कौन नाले-नालियों में डालता है। जब नगर निगम नालों की सफाई करे तब सडक़ किनारे पड़ी सिल्ट से दिक्कत होती है। सिल्ट ना निकालें तो नाले के ओवर फ्लो से दिक्कत होती है। बरसात ना पड़े तो गर्मी से दिक्कत, बरसात हो जाए तो पानी से दिक्कत, थोड़ी सी बरसात हो जाए तो पानी से दिक्कत, फिर सर्दी ना पड़े तो उससे दिक्कत, सर्दी पड़ जाए तो उससे दिक्कत। आखिर इंसान को संतुष्टिï किस चीज से मिलेगी? या किस मौसम में मिलेगी। आह, बरसात की खूबसूरती को लेकर साहित्य भरा पड़ा है। अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई, मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई, ये कितना प्यारा शेर है। अगर शायर जलभराव को परेशानी मानता तो क्या इस शेर को लिख पाता? क्या किशोर कुमार एक लडक़ी भीगी-भागी सी, सोती रातों में जागी सी, गा सकते थे? हिन्दी और उर्दू साहित्य में बरसात को एक मौसम नहीं माना गया। बल्कि मानवीय संवेदनाओं, दर्शन, प्रकृति के सौन्दर्य, ठंडी फुहारों में प्यार की बढ़ती पींगे और प्रकृति के खिलखिलाने की अभिव्यक्ति माना गया है। बरसात तो प्रेम और विरह की भावनाएं जागृत कर देता है। बरसात ना होती तो क्या महाकवि कालीदास मेघदूत लिख सकते थे? शायद नहीं। जायसी का नागमति वियोग वर्णन हमें मिल सकता था? शायद नहीं। अरे बरसात की बूंदें तो जीवन को पवित्र करने का प्रतीक माना जाता रहा है। तो बरसात को आफत नहीं नवजीवन का कारक मानिए। मत भूलिए कि आज भी भारत का किसान मानसून के भरोसे रहता है। वरना अनाज, दाल, चावल खरीदने पर रोना पड़ेगा। जलभराव आपकी और हमारी अपनी पैदा की हुई दिक्कतों से हो रहा है। इसके लिए बरसात को दोष ना दिया जाए तो ही बेहतर है।