पहले एक कहानी बताता हूं। यह कहानी आपने प्रेमानंद महाराज व कथा वाचक इंद्रेश से सुनी होगी। ध्यान से पढि़एगा। एक साधु भिक्षाटन के लिए निकले। सुबह से शाम हो आई मगर उन्हें कहीं भिक्षा नहीं मिली। खिन्न मन से जा रहे थे रास्ते में एक कुत्ता लेटा हुआ था। साधु ने कुत्ते को चार लठ पेल दिए। कुत्ता भगवान के पास गया। उसने भगवान से पूछा कि मेरा क्या दोष था, मैंने ना उनको भौंका, ना कुछ किया फिर मुझे उन्होंने चार लठ क्यों मारे। आप उनको सजा दीजिए। भगवान बोले कि साधु को दंड देने का प्रावधान मुझमें नहीं है। हां तुम चाहो तो उन्हें कोई भी दंड दे सकते हो। कुत्ता बोला तो ठीक है, उन्हें किसी बहुत बड़े मठ का महंत बना दो। भगवान चौंकर बोले किसी बड़े मठ का महंत बनाकर तुम क्या दंड दे रहे हो यह तो पारितोषिक हुआ। कुत्ता बोला आप समझ नहीं रहे हो, मैं भी एक बड़े मठ का महंत था। दान और चढ़ावा दबा लिया करता था। जो सामग्री आपके लिए श्रद्घालु दे जाते थे, उनको अपने प्रयोग में ले लेता था। उसी का परिणाम है कि आज मैं कुत्ता बना हुआ हूं। कल को यह साधु मठ का मंहेत हो जाएगा तो दान चढ़ावा और भगवान की सामग्री प्रयोग करेगा फिर कुत्ते की योनी में आएगा तब इसको इसका दंड मिलेगा, जैसे मुझे मिला है। यह तो आप समझ ही गए होगे कि मैंने यह कहानी राम मंदिर के चढ़ावा चोरी के मामले में कही है। जिन लोगों ने चोरी की है उन्हें तो उनके कर्म के हिसाब से दंड मिलेगा ही। मगर दानकर्ता भी सही नहीं कर रहे हैं। शास्त्र आज्ञा है, अनेक आचार्य चरण कहते हैं कि दान कर देने के बाद देने वाले का उसपर कोई अधिकार नहीं रह जाता। दान में दी गई राशि या वस्तु का किस तरह से प्रयोग किया जा रहा है, जानने का भी दाता को कोई अधिकार नहीं है। आपने रुपया, पैसा, सोना, चांदी जो कुठ भी मंदिर को दान में दिया है, उसके बारे में जानकारी मांग कर, रसीद मांग कर आप शास्त्र विरुद्घ काम करे हो। यह भी तो एक तरह का पाप ही कहा जाएगा। हमारे तो कहा जाता है दान ऐसे दो कि दांए हाथ से दें और बांए हाथ को पता भी ना चले। तब दान की महिमा है, तब ही वह सार्थक है, तब ही उसका पुण्य लाभ मिलेगा।