मानसून की दस्तक से फिर खुली पोल
हर साल मानसून की दस्तक के बाद शहर में जल भराव को लेकर जिस तरह आम आदमी परेशान होता है। घरों में कैद हो जाता है, गाडिय़ां पानी में डूब जाती हैं, लेकिन केवल बयानबाजी के अलावा कोई भी कार्रवाई नहीं होती। करोड़ों रुपए नालों की सफाई पर खर्च करने के दावे होते हैं लेकिन अधिकारियों के आवास पर भी पानी की निकासी नहीं होने के कारण वो भी जलभराव से जूझते हैं। आखिरकार इसका समाधान कब होगा। ये ठीक है कि करोड़ों रुपए आते हैं उनकी बंदरबांट हो जाती है, लेकिन अगर गौर करें तो इस जलभरावों के लिए निगम के साथ कई और लोग भी जिम्मेदार हैं। सारे नाले बंद पड़े हैं, कहीं निकासी नहीं है, चाहे पॉश कॉलोनी हो या दूसरे इलाके हो लोगों ने नाले बंद कर दिये हैं। किसी ने दुकान बना ली है, किसी ने फुलवारी लगा ली है। किसी ने जनरेटर रख लिए हैं। किसी ने आधे-आधे नाले पाट कर घर में डाल लिये हैं तो आखिरकार कैसे जल निकासी होगी। गाजियाबाद में हरदेव सिंह बाबा जो नगरायुक्त थे उनको लोग आज भी याद करते हैं। क्योंकि उन्होंने सबसे पहले घरों के आगे बने रैम्प तोड़े थे। उससे काफी हद तक जल निकासी की समस्या हल हुई थी लेकिन उनके जाने के बाद फिर वही काम हो गया। रैम्प बना लिये गये और आज हाईटैक सिटी थोड़ी सी बारिश में सैलाब सिटी बन जाती है। दरअसल, अगर निगम अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करता है तो फिर राजनीति शुरू हो जाती है। ये ठीक है कि ये जिम्मेदारी निगम की है लेकिन आम लोग भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। इसलिए संयुक्त रूप से प्रयास हो और इस गंभीर समस्या का समाधान होना चाहिए। जय हिंद