सामाजिक संस्था रसम के संचालक संदीप त्यागी पिछले काफी समय से गाजियाबाद का नाम बदलकर गजप्रस्थ करने का अभियान चला रहे हैं। बुधवार के अंक में इसी कॉलम मैंने गाजियाबाद की यातायात व्यवस्था पर लिखा था। इस पर कई लोगों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। भाजपा के वरिष्ठ नेता डाक्टर वीरेश्वर त्यागी ने भी अपनी प्रतिक्रिया में एक गंभीर मामला उठाया है। उन्होंने गाजियाबाद कमिश्नरेट पुलिस, नगर निगम, जीडीए आदि की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। उन्होंने गाजियाबाद में बढ़ रही झुग्गी-झोपडिय़ों की संख्या और फुटपाथ और सडक़ पर हो रहे कब्जे के कारण का मामला उठाया है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो गाजियाबाद का नाम या तो यातायात जाम नगर रखना पड़ेगा या फिर झुग्गीयाबाद। क्योंकि गाजियाबाद में जिस तादाद में झुग्गियों की संख्या बढ़ रही है, वह बहुत ही चिंताजनक है। जब झुग्गी बस रही होती हैं तब कोई ध्यान नहीं देता, बाद में उनको हटाया जाता है। पिछले दिनों कनावनी में झुग्गियों में लगी आग ने इस चिंता को बढ़ा दिया है। ज्यादातर झुग्गियां सरकारी जमीन पर ही बसी हैं। इसमें भी अधिकतर नगर निगम की जमीन पर हैं और कहीं-कहीं जीडीए या आवास विकास परिषद पर। हालांकि जीडीए व आवास विकास परिषद अपनी जमीन को लेकर बहुत संजीदा रहते हैं और आसानी से कब्जा नहीं होने देते। मगर नगर निगम इस मामले में हीलाहवाली करता ही है। मेयर सुनीता दयाल ने कई स्थानों पर नगर निगम की करोड़ों की जमीन अवैध कब्जा मुक्त कराई है। मगर अभी भी बहुत सी जमीन लोगों के कब्जे में है, ऐसा बताया जाता है। जब किसी जमीन पर झुग्गी बसनी शुरू होती हैं तब ही उनको क्यों नहीं हटाया जाता? या अवैध कब्जा हो जाने के बाद क्या नगर निगम में आजतक किसी कर्मचारी अथवा अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई है? फुटपाथ और सडक़ पर कब्जा जमाए खड़े ठेली-पटरी वालों को हटाने की जिम्मेदारी नगर निगम की है या यातायात पुलिस की? यह भी कोई बताने को तैयार नहीं है। चौराहों पर पुलिस भी खड़ी रहती है और यातायात में बाधक बनती ठेलियां, रिक्शा आदि भी। मगर सब अनदेखा कर दिया जाता है। ऐसा लगता है कि अधिकारियों को आज भी केवल आंकड़े दिखाने से मतलब है, सच से नहीं।