हम सभी जाने हैं कि गाजियाबाद में एक के बाद एक लगातार हत्या की दो घटनाएं हुईं। एक ईद के दिन और दूसरी उसके अगले दिन। ईद के दिन खोड़ा में दोस्ती और भरोसे का कत्ल कर दिया गया। तो अगले साईं उपवन में विश्वास की हत्या कर दी गई। यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मामूली विवाद के बाद भी खोड़ा का सूर्या यह कह कर असद के पास चला गया कि भाईचारे में झगड़े को जगह नहीं है। उसे अपनी दोस्ती पर भरोसा था। मगर असद ने सूर्या की बेहरमी से हत्या कर दी। दूसरी तरफ सैंतली गांव के चिराग को उसी के साथी ने मार डाला। पुलिस की थ्योरी का तो मुझे पता नहीं। मगर दिल्ली से लौटते समय अगर आरोपी यश खटीक और पैरा खिलाड़ी चिराग साईं उपवन तक पहुंचे। तो निश्चित तौर पर हत्या की साजिश रच चुका यश उसे किसी बहाने से ही घटना स्थल तक ले गया होगा। चिराग को भी अपने साथी खिलाड़ी पर विश्वास रहा होगा तभी तो वह चला गया। अगर उसको जरा सा भी अंदाजा होता कि यश कुछ गलत करने की सोच रहा है तो यकीन मानइए वह कतई नहीं जाता। यही बात सूर्या पर भी लागू होती है, उसको भी अंदाजा नहीं था कि असद के इरादे क्या हैं। घटना के बाद असद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया तो यश खटीक गिरफ्तार किया गया। यहां भी सवाल उठ रहे हैं कि अगर असद का एंकाउंटर हो सकता है तो यश का क्यों नहीं? हत्यारे तो दोनों ही हैं। ऐसे में कुछ लोगों को यह बात कहने का मौका भी मिल जाता है कि पुलिस अपराधी का धर्म देखकर कारवाई कर रही है। हालांकि ऐसा है नहीं, पुलिस की कार्रवाई अपराध करने के तरीके, मकसद और समाज पर पडऩे वाले असर पर आधारित होती है, ऐसा मुझे लगता है। चिराग हत्या मामले में कोई एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा जो आरोपियों के खिलाफ ना बोल रहा हो। लेकिन खोड़ा मामले की विडियो देख लिजिए कोई कहता है उसे घटना की जानकारी नहीं है, कोई कह रहा वह बाहर का रहने वाला है, कोई कह रहा उसे नहीं मालूम। मगर कोई व्यक्ति यह कहने को तैयार नहीं है कि असद ने बुरा किया, गलत किया। इसी मानसिकता को लोगों को छोडऩा होगा। सही को सही और गलत को गलत कहना सीखना होगा। दूसरी बात यह कि चिराग के परिजनों ने जो आरोपी यश के भाई व चाचा पर लगाए हैं उनकी भी जांच होनी चाहिए।