अंतिम संस्कार के बाद पुलिस मृतक के कौन से अंग व किस पदार्थ को करके रखती है प्रिजर्व
-विपिन चौधरी-
गाजियाबाद (युग करवट)। पुलिस महकमा ब्रिटिश शासन काल से ही एक ऐसे नियम को फॉलों करता चला आ रहा है जो अपने अंदर कई अनसुलझे सवाल रखता है।
जी हां हम यहा बात कर रहे उस नियम की जिसके तहत पुलिस किसी भी अज्ञात व्यक्ति के शव को ७२ घंटे तक मोर्चरी में सुरक्षित रखती है। पुलिस के मुताबिक ये ७२ घंटे कितने महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील होते हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन घंटे में वो थाना पुलिस, जिसके क्षेत्र में किसी अज्ञात की लाश मिलती है, उसके थाना प्रभारी से लेकर मुंशी तक इन पीक ऑवर्स में ऐसे सभी उपक्रम करती है कि जिससे उस अज्ञात व्यक्ति की किसी भी प्रकार से शिनाख्त हो जाये। अगर इतने प्रयास के बाद भी उस अज्ञात व्यक्ति अथवा महिला के शव की शिनाख्त नहीं हो पाती है तो पुलिस अपने स्तर पर उस शव का अंतिम संस्कार कराकर अपने पास उस व्यक्ति के शरीर की अस्थी मज्जा, थाई बोन का टुकड़ा व बिसरा आदि पदार्थ फोरेंसिक लैब जैसे सुरक्षित स्थान पर प्रिजर्व करके रख लेती है। साथ ही पंचायतनामे के समय भरा गया मृतक का हुलिया, उसकी फोटो और उसके कपड़े-जूते के अलावा घटनास्थल पर मिली मिटï्टी ए आलूदा भी सुरक्षित रख लेती है। एडिशनल सीपी कानून व्यवस्था राजकरन नैय्यर का भी कहना है कि ये ७२ घंटे पुलिस के लिये बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। श्री नैय्यर ने बताया कि अज्ञात शव के मिलते ही संबंधित थाने के एसएचओ अथवा एसओ फील्ड यूनिट के साथ घंटनास्थल पर पहुंचकर पहले तो उस शख्स की लाश का पंचायतनामा भरती है। उसके बाद मिटï्टी ए आलूदा और वहां पर मिली मृतक की वस्तुएं और अन्य सामान को सील करने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिये मोर्चरी पर पहुंचाकर अग्रिम कार्रवाई करनी शुरू कर देती है। श्री नैय्यर ने बताया कि उसके बाद थाना पुलिस मृतक की शिनाख्त के प्रयास करना शुरू कर देती है। इसके तहत संबंधित थाना पुलिस जहां सबसे पहले उक्त घटना की सूचना आरटी सैट के माध्यम से अन्य थानों की पुलिस को दे देती है और साथ ही मृतक का हुलिया व शरीर पर पाये गये निशान आदि की जानकारी देकर उन थानों की पुलिस से किसी गुंमसुदगी के बारे में पूछा जाता है। अगर इतना करने पर भी मृतक की शिनाख्त नहीं हो पाती है तो उस व्यक्ति अथवा महिला हुलिया वाले पंपलेटï्स न केवल कमिश्नरेट अथवा जनपद के स्भी थानों पर पहुंचा दिये जाते हैं बल्कि विभिन्न प्रचार व प्रसार के माध्यमों से आस-पास के जनपदों व सीमावृत्ति राज्यों की पुलिस से भी संपर्क करके मृतक अथवा मृतका के बारे में जानकारी ली जाती है। उसके बाद पुलिस समाचारपत्रों, रेडियों और टेलीवीजन के अलावा सोशल मीडिया के माध्यम से संबंधित शव की शिनाख्त करने के लिये प्रचार व प्रसार करती है। इसके अलावा पुलिस विभिन्न एप्स के माध्यम से भी उक्त शव की शिनाख्त करने के यतन करती है।
७० घंटे ही क्यों जब इस बावत श्री नैय्यर से पूछा गया तो उनका कहना था कि इस मामले में पुलिस की सोच यह होती है कि पहले दिन उस शख्स की गुमशुदगी दर्ज ना कराई गई हो जिसकी लाश मिली। दूसरे दिन यह सोचकर इंतजार किया जाता है कि अगर किसी थाना क्षेत्र में कोई लापता हुआ होगा तो अब तक उसकी गुमशुदगी दर्ज कराने की कवायद उसके परिजनों ने कर दी होगी। तीसरे दिन संबंधित थाना पुलिस यह सोचकर अन्य थानों की पुलिस से संपर्क करती है कि अब तक तो इस मृतक की गमसुदगी किसी ना किसी थाने में दर्ज हो गई होगी। तीसरा दिन बीत जाने पर भी अगर उस मृतक अथवा मृतका की शिनाख्त नहीं हो पाती है तब संबंधित थाना पुलिस उस शव का अंतिम संस्कार कर देती है। श्री नैय्यर ने बताया कि इन ७२ घंटों में हुई संपूर्ण कार्रवाई को पूरी तरह से दस्तावेजों में आलेखित किया जाता है। श्री नैय्यर से जब यह पूछा गया कि ७२ घंटे के बाद जब पुलिस मृतक का अंतिम संस्कार कर देती है तो उसके बाद मृतक की शिनाख्त करने व उसकी मौत की गुत्थी सुलझाने के लिये पुलिस क्या कार्रवाई करती है तो उन्होंने बताया कि उस घटना के अनावरण के लिये उस समय तक निरंतर प्रयास करती है कि जब तक उसके खुलासे की गुंजाइश रहती है।