लखनऊ (युग करवट)। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन बरेली मंडल की सियासत में बारूद बिछ चुका है। पिछले विधानसभा चुनाव में बदायूं बरेली में जड़ें जमाने और फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने वाली सपा अब पूरे रुहेलखंड में बिसात बिछाने में जुट गई है। भाजपा में उपेक्षित पड़े नेताओं और हाशिये पर आए पुराने समाजवादियों को जोडक़र सपा ने सियासी चक्रव्यूह की रचना शुरू कर दी है। यूं तो बदायूं सपा का पुराना गढ़ रहा है, लेकिन मोदी-योगी युग शुरू होते ही भाजपा यहां हावी हो गई थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने बदायूं की तीन और बरेली की दो सीटों पर कब्जा कर दोबारा ताल ठोंकी थी। फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में बदायूं और आंवला जैसी सीटों पर मिली बढ़त ने सपाइयों में जोश भरा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मंडल में गैर-यादव ओबीसी, खासकर शाक्य और कश्यप बिरादरी को जोडक़र पार्टी अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को जमीन पर उतारने में जुटी है। इस घेराबंदी के बीच भाजपा भी मंडल के कुर्मी और लोध मतदाताओं को एकजुट रखने के लिए बड़ा सियासी दांव चल चुकी है। पार्टी ने झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह को राज्यसभा भेजकर यह संदेश दिया है कि अपने मजबूत आधार को वह किसी भी कीमत पर खिसकने नहीं देगी। आंवला से भाजपा के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप पहले ही भाजपा छोड़ चुके हैं। उनके निर्वाचन क्षेत्र में बदायूं की दो सीटें दातागंज व शेखूपुर आती हैं। वह भी भाजपा में असंतोष झेल रहे थे। सपा की ओर रुख करके उन्होंने अति-पिछड़े तबके, खासकर कश्यप और मल्लाह बिरादरी में सियासी असंतोष को भुनाने की कोशिश है। ऐसे ही शाहजहांपुर से प्रदीप पांडेय, तिलहर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख सौरभ सिंह गांधी और बसपा के रामाकांत गौतम की आमद से सपा यह संदेश देना चाहती है कि उसका गठबंधन सिर्फ पारंपरिक जातियों तक सीमित नहीं है। पीलीभीत में पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू को जोडक़र सपा ने परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश की है।