देशभर में एसआईआर पर पूरा विपक्ष हल्ला मचा रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हल्ला बोल अभियान चलाया हुआ है। ऐसा दिखाया जा रहा है कि जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त इस समय के सबसे बड़े विलेन हैं। ठीक है विपक्षी दलों का मुख्य काम सरकार के हर कदम का विरोध करना ही रह गया है। मगर क्या यही विपक्ष की राजनीति रह गई है। एसआईआर के तहत अगर कुछ विपक्षी नेताओं को नोटिस मिले हैं तो क्या सत्ता पक्ष के नेता इससे अछूते रह गए हैं? क्या वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को नोटिस जारी नहीं किए गए? सारी बातें छोडि़ए विपक्ष केवल इतना बताए कि क्या देश में फर्जी मतदान नहीं होता रहा है? क्या बहुत से लोगों के दो-दो स्थानों पर वोट नहीं बने हुए थे। मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे कितने ही लोगों को जानता हूं जो पहले गांव में रहते थे, वहीं पर उनकी वोट थी, बाद वह शहर में जाकर बस गए और वहां भी उनकी वोट बन गई। विपक्षी दल बताएं कि क्या स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए फर्जी मतदान रोका जाना आवश्यक नहीं है? विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस यह भी बताए कि क्या बंगलादेशी नागरिकों के वोट हमारे यहां नहीं बन गए थे? क्या एक ही मकान पर दर्जनों वोट नहीं बने हुए थे? क्या कांग्रेस समेत सभी दल चाहते हैं कि फर्जी वोट बने ही रहें? मुझे नहीं लगता कि कोई भी विपक्षी नेता मेरे ऐसे किसी भी सवाल का जवाब देना चाहेगा। सही बात तो यह है कि उन्हें जवाब देना भी नहीं चाहिए। क्योंकि यदि कोई ऐसा करता है तो उसी की राजनीति प्रभावित हो जाएगी।
मुख्य चुनाव आयुक्त को भला बुरा कहने से, उनका इस्तीफा मांगने से क्या विपक्ष को जनता वोट दे देगी? आज कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को किसान के हालात की बात करनी चाहिए, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी की बात करनी चाहिए। महंगे इलाज और शिक्षा की बात करनी चाहिए। जनता की मूल समस्या पर किसी नेता का ध्यान नहीं है। दूसरी बात मुख्य चुनाव आयुक्त हों या कोई ओर, उस पर या उसके परिवार पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने का किसी को अधिकार नहीं है।