विधानसभा चुनाव २०२७
विधानसभा चुनाव २०२७ को लेकर सबसे ज्यादा जो पूरी मुस्तैदी के साथ तैयारी में लगी है वो भाजपा ही है। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है, केंद्र के अलावा कई राज्यों में सरकार है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में लगातार दस साल से सरकार है और अब फिर रिपीट करने को लेकर तैयारी शुरू हो गई है। लेकिन इस बीच बहुत तस्वीरें ऐसी सामने आ रही है जिससे अपने ही लोग नाराज होते नजर आ रहे हैं। आज की भाजपा में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं की संख्या ज्यादा है। इसलिए उनका सम्मान भी होना चाहिए। अगर पूरी यूपी की बात करें तो डिप्टी सीएम से लेकर कई मंत्री और विधायकों की संख्या मिलाई जाए तो 62 ऐसे भाजपा में विधायक हैं जो बसपा से आये हैं। गाजियाबाद की बात की जाए तो यहां भी बसपा और सपा से आने वाले नेताओं की संख्या ज्यादा है। अब कोई कार्यक्रम होता है तो सभी को मंच चाहिए है, बड़े नेता को चेहरा भी दिखाना है, चुनावी मौसम है इसलिए चेहरा दिखाना बहुत जरूरी है। कल राष्टï्रीय अध्यक्ष के आगमन के दौरान जो कुछ हुआ वो सभी ने देखा। ये अच्छा नहीं है। सभी को एक प्रोटोकॉल का ख्याल रखना चाहिए। हालांकि राष्टï्रीय अध्यक्ष के सामने सभी प्रोटोकॉल छोटे हो जाते हैं लेकिन फिर भी अगर बात की जाए तो आम कार्यकर्ता का प्रोटोकॉल राष्टï्रीय अध्यक्ष से बड़ा हो जाता है क्योंकि असली रीढ़ की हड्डी कार्यकर्ता ही होता है। तीसरी आंख ने देखा कि कई बड़े नेताओं में धक्का-मुक्की भी हुई, बहस भी हुई और तीखी बहस हुई जो चुनावी मौसम में ठीक नहीं है। हालांकि कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा, क्षेत्रीय सांसद अतुल गर्ग बहुत ही शालीनता के साथ खड़े रहे उन्होंने कोई भी आगे बढऩे की होड़ नहीं दिखाई। वहीं गठबंधन धर्म भी नहीं निभाया जा रहा है। रालोद के वरिष्ठ नेता इंद्रजीत सिंह टीटू ने बहुत ही शालीनता के साथ अपनी बात रखी और अपने दर्द का भी अहसास कराया। गठबंधन का मतलब ये नहीं है कि चुनाव में ही सब एक साथ दिखाई देंगे गठबंधन का मतलब ये है कि एक गांठ और उसमें सभी को बांधे रखना चाहिए। कोई भी कार्यक्रम हो तो गठबंधन को भी आमंत्रित करना चाहिए। पार्टी की बैठक में भले ही ना बुलाया जाये लेकिन पार्टी कोई कार्यक्रम करती है तो गठबंधन नेताओं को भी मंच मिलना चाहिए। इससे अच्छा संदेश जाता है। यहां पर स्थिति ये हो रही है कि ना अपनों पर सितम है और ना ही गैरों पर करम है। जय हिंद