पीलीभीत प्रकरण

टीवी सीरियल सीआईडी में डीएसपी प्रद्ययूमन का एक बहुत ही प्रचलित डायलॉग है जिसमें वो किसी भी घटना के बाद कहते हैं कि ‘दया कुछ तो गड़बड़ है’। अब ये डायलॉग पीलीभीत में जो कुछ हुआ उसके बाद लोगों की जुबान पर आने लगा और लोग कहने लगे हैं कि विपक्ष भले ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा है लेकिन पीलीभीत में जो कुछ सामने आया है उसको देखकर यही लग रहा है कि कुछ तो गड़बड़ है और जब लोगों के मन में इस तरह के सवाल आते हैं तब फिर तस्वीर कुछ और ही है। पीलीभीत में एक ही विधानसभा में 13 हजार वोटर काट दिये गये और नये जोड़ दिये गये। मामला सामने आने के बाद दो एसडीएम सहित चार कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पीलीभीत में जो कुछ हुआ वो सरासर नियम विरूद्घ है। एक व्यक्ति दस लोगों के नाम कटवाने का आवेदन कर सकता है ये नियम है। लेकिन पीलीभीत में एक व्यक्ति ने तीन-तीन सौ लोगों के नाम कटवाये और उसमें ९५ प्रतिशत जाति विशेष के वोट थे। जाहिर है ये एक विधानसभा की तस्वीर है जो पकड़ में आ गई अगर यही हालत रही और गहराई से जांच हुई तो फिर विधानसभा चुनाव २०२७ से पहले तो लाखों वोट किस तरह कटे हुए सामने आ सकते हैं। ये बड़ा गंभीर मामला है। आखिरकार ये सब कुछ फॉर्म-8 के तहत हुआ। अब विपक्ष के दबाव के बाद फार्म-8 को खत्म करने की बात चल रही है लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी है। तीन महीने बाद यूपी में आचार संहिता लग जाएगी। वास्तव पीलीभीत जनपद जैसी घटनाएं अन्य जनपदों में भी हुई होंगी तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है। अगर कहीं नहीं भी हुई होंगी तो लोगों के मन में एक सवाल तो खड़ा हो गया है। सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वो बचाव के बदले क्या तथ्य है इसको सामने आकर बताये। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बचाव करने के बजाय सरकार ये बताये कि विपक्ष के आरोप सरासर निराधार है लेकिन आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह का ये आरोप है कि इतने बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट में गड़बडिय़ां की गई और जाति विशेष के वोट काटे गये हैं। इसलिए सरकार जवाब दे ही नहीं सकती। बहरहाल, जो कुछ भी हो, क्या सच्चाई है ये तो चुनाव आयुक्त ही जान सकता है लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की कार्यप्रणाली पर अगर सवाल उठने लगते हैं तो इससे नि:संदेह लोकतंत्र पर भी सवाल उठने लगते हैं। जय हिंद