दिल्ली की सियासत
भारत में किसी को भी अराजकता की इजाजत नहीं है। और कोई ये सोचता है कि वो भीड़ के सहारे सरकार का तख्ता पलट देगा तो ये उसकी गलतफहमी है। इतना ही नहीं सडक़ पर भी हर फैसले नहीं होते। भारत का मिजाज अन्य देशों से बिल्कुल अलग है। यहां देश सर्वोपरि है कुछ मुट्ठी भर लोग अगर भीड़ इकट्ठी करके सडक़ पर फैसला लेने की बात करेंगे या फिर तख्ता पलट की सोचेंगे तो उनकी दुकान ज्यादा नहीं चलेगी। ये देश मुद्दों को लेकर अपनी बात करता है। लेकिन देश को विभाजित करने की या फिर भीड़ के नाम पर लोकतंत्र को बदनाम करने की कोशिश करेगा तो ये देश उसे माफ भी नहीं करता। २०१४ के बाद देश की राजनीति में बहुत बदलाव आया है और लोगों के अंदर एक मैसेज गया कि देश अब मजबूत हाथों में है। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी को लेकर भी एक जमाने में लोगों की अच्छाी राय बनी थी। लेकिन पिछले दस सालों में यूपीए की ये सरकार और उसमें देश का प्रधानमंत्री जो खामोश रहा उसके बाद फिर लोगों में २०१४ के बाद जो बदलाव आया उसने सबको हिला दिया। प्रधानमंत्री मोदी पर इतना भरोसा किया कि नोटबंदी हो गई तब भी खामोश रहे, गैस सिलेंडर चार सौ से लेकर एक हजार का हो गया तब भी खामोश रहे, खाने के मसालों की कीमत आसमान छूने लगी तब भी खामोश रहे। सब्जी और दालें आम आदमी की थाली से गायब हो गई तब भी खामोश रहे क्योंकि उन्हें मोदी जी पर पूरा भरोसा है। अब रातोंरात एक कॉकरोच पार्टी बनी और एक ऐसे मुद्दे को लेकर उसने आवाज बुलंद की जो देश के युवाओं से जुड़ा था युवाओं के साथ खड़ा हुआ और उन्हें सफलता भी मिली केंद्र के मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा लेकिन अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर कॉकरोच पार्टी ने जो आंदोलन का बिगुल बजाया वो बिगुल फ्लॉप हो गया। उसके नेता गिरफ्तार कर लिये गये, तिहाड़ भेज दिये गये और दीवाली तक आंदोलन को स्थगित कर दिया गया। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख दीपके ने कहा कि सभी कार्यकर्ता परिवार के साथ दीवाली मनाये। जाहिर है इसके पीछे आंदोलन का असफल होना है। दिल्ली में हर कोई कब्जा कर ले ये आसान नहीं है। 10 अक्टूबर को ना कोई सडक़ें जाम हुई ना कोई आंदोलन को बल मिला क्योंकि राजनीतिक मुद्दे पर देश एक दल के साथ खड़ा नहीं होता। जनहित के मुद्दे पर बात बन सकती है यहीं कारण है कि जो दवा-ए-दर्दे दिल बेचने निकले थे वो अपनी दुकान बढ़ा चले।
जय हिंद