कितनी विडंबना है कि गाजियाबाद जैसे शहर में भी सरकारी स्कूलों की हालत ठीक नहीं है। विद्यालयों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है। फिर यह मंदिर इतने दूषित, असुविधाओं से युक्त, बच्चों के लिए कष्टïकारी क्यों है। प्राथमिक विद्यालयों में सुधार के लिए सरकार अनेक योजनाएं चलाती है। शिक्षा विभाग और प्रशासन भी अनेक दावे करता है। मगर क्या सरकार के किसी मंत्री, विधायक या अन्य किसी जनप्रतिनिधि ने अपने क्षेत्र के किसी प्राथमिक सरकारी स्कूल का हाल जानने का प्रयास किया है? केवल गाजियाबाद की ही बात करें तो कितने ही ऐसे स्कूल हैं जहां तक पहुंचने का रास्ता तक नहीं है। कितने ही स्कूलों में बच्चों के बैठने की उचित व्यवस्था तक नहीं है। समय पर युनिफार्म नहीं मिलती, अन्य किसी सुविधा को तो छोड़ ही दीजिए। गाजियाबाद का एक उदाहरण भोपुरा के सरकारी स्कूल का लिया जा सकता है। भोपुरा के सरकारी स्कूल तक जाने वाला रास्ता करीब तीन वर्षों से जर्जर है। रोजाना स्कूल आने-जाने वाले छात्र-छात्राओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय लोग कई बार जिलाधिकारी कार्यालय में शिकायत कर चुके हैं। अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण भी किया। किंतु कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। कुछ दिन पहले कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा एक स्कूल पहुंचे थे। वहां उन्होंने शिक्षक के रूप में बच्चों को भूगोल भी पढ़ाया था। क्या यह अच्छा नहीं होता कि कैबिनेट मंत्री नियमित रूप से अपने विधानसभा क्षेत्र के सरकारी स्कूलों का दौरा करें और प्राथमिक स्कूलों की हालत की सच्चाई जानें। इसी तरह विधायक संजीव शर्मा, अजीत पाल त्यागी, मंजू सिवाच, नंदकिशोर गुर्जर अपने अपने क्षेत्रों के स्कूलों की हालत जानें, जहां जो कमी है उसे दूर कराएं। ताकि बच्चों को सुविधाजनक माहौल मिल सके। सवाल यह भी है कि क्या हमारे जनप्रतिनिधियों का यह नैतिक दायित्व नहीं है कि वह प्राथमिक शिक्षा के मंदिरों को सुधारने के लिए शासन से पत्राचार करें, अपनी बात सरकार तक पहुंचाएं। क्या यह जनहित का कार्य नहीं होगा?