राजनीति में सक्रिय लगभग हर व्यक्ति का सपना होता है चुनाव लडऩा और जीतना। चुनाव किसी छोटे पद का हो या बड़े पद का जो जीत का स्वद एक बार चख लेता है, वह बार-बार उस स्वाद को लेना चाहता है। लेकिन अगर मैं यह कहूं कि ऐसे भी लोग हैं जो जीतने के बाद भी आगे चुनाव नहीं लडऩा चाहते तो शायद पाठक इसपर विश्वास नहीं करेंगे। मगर यह बात पूरी तरह से सत्य है। मैं बात कर रहा हूं गाजियाबाद के कुछ पार्षदों की। गाजियाबाद में ऐसे कई पार्षद हैं जो चार या उससे भी अधिक बार चुनाव जीत कर नगर निगम में अपने क्षेत्र की नुमाइंदगी कर चुके हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिन्होंने लगातार जीतने के बाद मिली हार से ही चुनाव लडऩा छोड़ा। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने कई बार पार्षद बनने के बाद खुद चुनाव लड़ा छोड़ा। मगर वर्तमान गाजियाबाद नगर निगम में ऐसे कई पार्षद हैं जो पहला चुनाव जीते और अब आगे चुनाव नहीं लडऩा चाहते हैं। यह बात कई पार्षदों ने खुद बताई। ऐसे अधिकतर पार्षदों ने चुनाव नहीं लडऩे की कोई वजह नहीं बताई। बहुत कुरेदने पर दो पार्षदों ने अपना दर्द बताया। उन्होंने बताया कि वह भी जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं। दो से तीन हजार लोगों ने वोट देकर उनको चुना है। वार्ड की जनता के प्रति उनके बड़े दायित्व हैं। उनको पूरा करने के लिए वह लोग दिन रात कड़ी मेहनत करते हैं। यदि वार्ड में सडक़, पानी, सफाई, पार्क आदि की कोई समस्या होती है तो जनता की कड़वी बातें पार्षदों को ही चुननी पड़ती हैं। सांसद, विधायक या किसी मंत्री को जनता से रोजाना आमना सामना नहीं होता। अगर उनका आमना-सामना हो भी जाता है तो बहुत अधिक समस्या की सुनवाई नहीं होती। नाली, खडज़े, स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याओं से पार्षदों को रोज जूझना पडत़ा है। अगर कोई पार्षद महापौर से, नगर निगम के अधिकारियों से अपने वार्ड के लिए काम की बात करता है तो उनके द्वारा ऐसा व्यवहार किया जाता है कि जैसे पार्षद अपने घर के लिए काम मांग रहा हो। उनका कहना है कि पार्षद जनता का भी बुरा बन जाता है और नगर निगम अधिकारियों का भी। पार्षद को अपना मान-सम्मान बचाना भारी पड़ जाता है। बस इसीलिए वह अगला चुनाव नहीं लडऩा चाहते। यह साी बात सही हो सकती हैं, मगर मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि जब इतनी दिक्कतें होती हैं तो कुछ लोग क्यों लगातार पार्षद बने रहना चाहते हैं।