गाजियाबाद में शायद ही ऐसा कोई इलाका होगा जहां सडक़ पर ठेली पटरी नहीं लगती हों। कुछ समय पहले तक तो साप्ताहिक बाजार भी सडक़ों पर लगते थे। कहीं कहीं तो मुख्य मार्गों पर बाजार लगने लगे थे। जब बात यातायात जाम की आई तब पुलिस प्रशासन की आंखें खुलीं और सडक़ों पर बाजार लगने बंद हुए। हालांकि अभी भी कुछ स्थानों पर साप्ताहिक बाजार के दौरान सडक़ पर ठेली लगाई जा रही हैं। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां नियमित रूप से या यूं कहें कि स्थाई रूप से ठेली पटरी लगाई जा रहीं हैं। कहने को तो गरीब लोगों को रोजगार है, मगर अव्यवस्था फैलती है और लोगों को परेशानी होती है, तो फिर गरीब की रोजी रोटी देखने को किसी का मन नहीं करता। गाजियााद शहर में ऐसे स्थानों में घंटाघर, बजरिया, डासना गेट बाजार, सिहानी गेट बाजार, नवयुग मार्केट, रमते राम रोड, अंबेडकर रोड, पटेल नगर मार्ग, विजयनगर में पानी की टंकी वाला रोड, प्रताप विहार इसके साथ ही नंदग्राम, संजय नगर, सेक्टर 23, गोविंदपुरम आदि बहुत से स्थान हैं जहां नियमित रूप से सडक़ पर ठेली लगती हैं। हाल ही में घंटाघर आदि बाजारों के व्यापारियों ने भी इस मामले में शिकायत की थी कि सडक़ पर अवैध कब्जे में सबसे जयादा भागीदारी ठेली पटरी वालों की है। इन्हें आज नगर निगम, यातायात पुलिस, जीडीए या कोई हटा दे। ये कल फिर से उसी स्थान पर नजर आने शुरू हो जाते हैं। बताया जाता है कि इसके पीछे एक पूरा सिंडीकेट बना हुआ है। पहले स्थानीय स्तर पर ठेली पटरी वालों को शेल्टर दिया जाता है, फिर उनके ऊपर कुछ सफेदपोश तथाकथित रूप से हाथ रख देते हैं। सूत्रों पर यकीन करें तो इसके एवज में ठेली पटरी वालों से कुछ रकम भी ली जाती है, जिसके कई हिस्सेदार भी होते हैं। ऐसे में जब इनके विरूद्घ सिलसिलेवार कार्रवाई शुरू होती है तो धरने प्रदर्शन कर दिए जाते हैं। प्रशासन पर कार्रवाई नहीं करने का दबाव बनाया जाता है। विरोध के आगे प्रशासन को अपनी कार्रवाई रोक देनी पड़ती है। तब स्थिति पहले जैसी हो जाती है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले वरदहस्त रखने वाले सिंडीकेट की कमर तोड़ी जाए। उन सफेदपोशों की पहचान सार्वजनिक की जाए। तब कार्रवाई हो।