पर्दे के पीछे चल रहा है खेल
आजकल की राजनीति अब पहले जैसी राजनीति नहीं रही है। आज एक फोन कॉल से ही सारी वफादारी साइड में चली जाती है और रातोरात झंडे बदल जाते हैं। अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल में जिस तरह की तस्वीर चल रही है। टीएमसी के टुकड़े हो रहे हैं इसमें बड़ा खेल चल रहा है। एक बड़ी मशहूर पंक्तियां है- ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी यूं कोई बेवफा नहीं होता।’ राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं पर भरोसा करे तो जिन सांसदों ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ा है उसके पीछे बहुत कुछ छुपा है। कुछ लोग तो आसानी से राजी हो गये और कुछ को पुरानी बातें याद दिलाई गई जिससे वो घबरा गये और फिर दीदी का साथ छोडऩे को मजबूर हो गये। अंतर्राष्टï्रीय क्रिकेट खिलाड़ी युसूफ पठान जिनको लेकर ममता खुद आयीं थी वो बेवफा हो जाएंगे या सयानी घोष जिसने विधानसभा चुनाव में पानी पी-पीकर भाजपा को कोसा हो वो ममता का साथ छोड़ देंगी लोगों के गले नहीं उतर रहा है। दरअसल, इन सबके पीछे भी कहीं ना कहीं इस तरह की राजनीति हो रही है कि ना चाहते हुए भी ममता का साथ छोडऩे को तैयार है। टीएमसी के एक सांसद जो पूर्व क्रिकेटर भी है उनका कहना है कि कोई फोन कॉल आता है और उसके बाद फिर टीएमसी सांसदों के फोन बंद हो जाते हैं। उनका कहना है कि युसूफ पठान के पास भी कोई फोन आया और वो दिल्ली गये उसके बाद उनका मोबाइल भी बंद हो गया। हो सकता है कि पूर्व क्रिकेटर की बात में कोई दम हो लेकिन एक मिसाल है जिसकी लाठी उसकी भैंस। आज की राजनीति में कुछ ये कहावत ज्यादा चरितार्थ हो रही है और मजबूत लाठी का अहसास भी कराया जा रहा है। बहरहाल, राजनीति में इतना बदलाव आयेगा ये शायद कभी सोचा भी नहीं था। ये बात ठीक है कि दो दशक से समर्पण, समन्वय और पार्टी के प्रति आस्था जैसे शब्द अब गुजरे जमाने की बात हो गई। अब कब कौन किसके साथ चला जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ निजी स्वार्थ के लिए पाला बदल लेते हैं तो कुछ आसानी से नहीं मानते फिर दूसरे तरीके से मनवा लिया जाता है। जय हिंद