कविनगर रामलीला विवाद
गाजियाबाद (युग करवट)। शहर की कुछ रामलीलाओं में पिछले साल काफी विवाद चला था। सेक्टर-23 और राजनगर की रामलीलाओं में तो कुछ ज्यादा ही विवाद रहा था। लेकिन इस बार आपसी सहमति से ये विवाद सुलझा लिये गये और भव्य तरीके से आयोजन हो रहा है। लेकिन इस बार कविनगर रामलीला कमेटी को लेकर विवाद कुछ ज्यादा बढ़ा।
अखबारों की सुर्खियां भी बनीं, प्रशासन से लेकर शासन तक मामला गया। इतना ही नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी मामला अभी विचाराधीन है। दरअसल, पूर्व सांसद डॉ. रमेशचंद तोमर सहित कई पुराने लोगों को समाजसेवी ललित जायसवाल जब अध्यक्ष थे तब उनकी कमेटी ने उन सबको एक नोटिस जारी किया और कहा कि आप लोग बैठक में नहीं आते। जिनको नोटिस जारी किया गया वो सभी कमेटी के आजीवन सदस्य थे। यहीं से विवाद शुरू हुआ और उसके बाद फिर मामला बढ़ता गया। कविनगर रामलीला के पास करोड़ों रुपये का फंड है और काफी मोटा पेमेंट भी जो वहां पर ठेके छोड़े जाते हैं उनसे लिये जाते हैं। पूर्व सांसद का कहना है कि रामलीला में हर गरीब आदमी भी जाता है। जब वहां पर करोड़ों रुपये में मेले के ठेके छोड़े जाएंगे तो फिर वो अपनी मनमर्जी से रेट तय करते हैं। आम आदमी वो पेमेंट नहीं कर सकता। उनका ये भी कहना है कि जो समोसा राकेश मार्ग पर दस रुपये का मिलता है वही समोसा कविनगर रामलीला में 50 रुपये का मिलता है। झूलों का किराया इतना महंगा होता है। इसके अलावा खान-पान की चीजे इतनी महंगी होती है क्योंकि वो मोटे पैसे देकर ठेका लेते हैं। उनका कहना है कि जब लोगों से चंदा लिया जाता है तो फिर करोड़ों रुपये का ठेका क्यों छोड़ा जाता है। गरीब रामलीला में जा ही नहीं सकता। उनका कहना है कि उनकी कोई लड़ाई रामलीला मंचन को लेकर नहीं है। उनकी लड़ाई केवल जो करोड़ों रुपया मेले के नाम पर लिया जाता है वो ठीक नहीं है और फिर उसको बर्बाद किया जाता है। बहरहाल, ये मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में भी गया। मुख्यमंत्री ने इस मामले को लेकर प्रमुख सचिव गृह संजय प्रसाद को लगाया। संजय प्रसाद ने स्थानीय प्रशासन के लोगों से बात की। लेकिन कोई हल नहीं निकला। पूर्व सांसद फिर इसी काम में लगे रहे। पूर्व सांसद ने फिर लखनऊ फोन लगाया। पूर्व सांसद का कहना था कि कमेटी बना दी जाए जो इन खर्चों की निगरानी करेगी। कमेटी बनी, एडीएम सिटी को अध्यक्ष बनाया, दोनों कमेटियों के लोगों में से चार-चार लोग लिये लेकिन ना कोई बैठक हुई ना ही किसी मेले को लेकर चर्चा हुई और फिर जो लोग सवाल उठा रहे थे उन्होंने फिर कमेटी से इस्तीफा दे दिया। सूत्रों ने बताया कि ये कमेटी सिर्फ एक दिखावा थी और टाईम पास करना था। एक सामाजिक व्यक्ति जो बहुत ही खामोश रहते हैं और सीधा प्रशासन में उनका दखल है उनकी बदौलत सारा खेल हो गया। ना कमेटी की बैठक हुई और ना ही कोई आगे की कार्रवाई हुई और यही हुआ कि लौटकर बुद्घू घर को आये वाली कहावत चरितार्थ हुई। किसी ने सही कहा है कि खामोश लोग अपनी खामोशी के जरिए वो सब कह देते हैं जो बड़बोले भी नहीं कह पाते और कुछ ऐसा ही हुआ। पर्दे के पीछे रहकर खामोश शख्स ने सभी को जोर का झटका धीरे से दे दिया।