कांगे्रस के प्रति बढ़ता रूझान
विधानसभा चुनाव २०२७ को लेकर इस बार कांगे्रस भी कुछ बड़ा करने के मूड में हैं। हालांकि सपा से गठबंधन को लेकर कांगे्रस की तरफ से और सपा की तरफ से भी कोई ऐसा बयान नहीं आता है जिससे ये लगे कि गठबंधन नहीं हो रहा है। सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद जरूर सपा को लेकर बयानबाजी करते रहते हैं और अखिलेश यादव पर भी तंज करते हैं। हालांकि सपा की ओर से कहा गया था कि वो एक सांसद हैं और उनका क्या जवाब दिया जाए। लेकिन अब कांगे्रस ने उन्हें प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर इस बात का अहसास भी करा दिया कि वो अब सांसद नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष भी होंगे यानि उनके बयान की भी अहमियत है। वहीं कांगे्रस में तीन दिन के अंदर जिस तरह ज्वाइंनिग का सिलसिला शुरू हुआ वो भी अपने आप में एक बड़ा संकेत है। इसमें कोई दोराय नहीं है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब 2014 को देश के प्रधानमंत्री बने थे उससे पहले उनका नारा कांगे्रस मुक्त था। लेकिन ऐसा हो ना सका और आज भी प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक कांगे्रस ही निशाने पर है और पंडित नेहरू तो हर चुनाव में याद किये जाते हैं। लोकसभा में पंडित नेहरू की ही चर्चा होती है। जाहिर है कि ना चर्चाओं में कांगे्रस मुक्त हुई और ना ही राजनीतिक तौर पर। जाहिर है कि एक मिसाल है कि हाथी मरने के बाद भी सवा लाख का होता है। जिस कांगे्रस ने देश में कई दशकों तक राज किया उसे आप कैसे मुक्त कर सकते हो। आज स्थिति ये है कि आज भी लोग भाजपा के बाद कांगे्रस ही चर्चा करते हैं। अभी जिस तरह उत्तर प्रदेश के नेताओं की ज्वाइंनिंग हो रही है वो भी अपने आप में इस बात का संकेत है कि कांगे्रस आज भी राजनीति में अहम भूमिका में है। मथुरा से आठ बार के विधायक श्यामसुंदर शर्मा ने भी कांगे्रस ज्वाइन की। वैसे भी आज भी ब्राह्मïणों की पसंद कांगे्रस ही है और जब कहीं कोई ठिकाना नहीं होता तो वो भाजपा में भी चले जाते हैं लेकिन पसंद कांगे्रस ही है। दलित समाज भी कांगे्रस का ही वोट रहा है और आज भी कांग्रेस के हाथ पर भी दलित समाज ही वोट करता है। जहां बसपा का कोई उम्मीदवार नहीं होता वहां हाथ का पंजा ही फिर उसकी दूसरी पसंद होता है। यूपी के एक और नेता जो लगातार बसपा में मंत्री रहे, भाजपा में भी मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्या भी कांगे्रस कार्यालय में दिखाई दिये। आदमी पार्टी की प्रियंका कक्कड़ वो भी कांगे्रस में शामिल हुई। इसके अलावा आईएएस पद से इस्तीफा देकर डॉ. राकेश वर्मा भी कांगे्रस में शामिल हो गये हैं। इसके अलावा अभी हाल ही में आईएएस से इस्तीफा देकर अपनी पार्टी बनाकर राजनीति में एंट्री करने वाली दिव्या मित्तल ने भी कांगे्रस के साथ जाने की बात कही है। हालांकि वो पूर्वांचल की मिर्जापुर सीट से चुनाव लडऩा चाहती है। यदि वो पार्टी नहीं बनाएंगी तो हो सकता है वो कांग्रेस का दामन थाम लें। इसीलिए जो दल कांगे्रस को हल्के में ले रहे हैं उन्हें जमीनी हकीकत भी समझना चाहिए। ये ठीक है कि कांगे्रस अपने बल पर कुछ नहीं कर सकती उसे भी बैसाखियों की जरूरत है। जय हिंद