विधानसभा चुनाव २०२७
विधानसभा चुनाव २०२७ को लेकर भाजपा ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है। यूपी में भाजपा मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगी। दो साल से योगीजी को लेकर अब हटे तब हटे वाली कहानी अब बंद हो गई है। क्योंकि उत्तर प्रदेश जीतना है तो योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर ही जीता जा सकता है। हालांकि अंदरखाने पार्टी के कुछ बड़े नेता भले ही योगी आदित्यनाथ से नाराज हो लेकिन यूपी में योगी के अलावा अब कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिस पर चुनाव लड़ा जाए। दोनो उपमुख्यमंत्री हों या वरिष्ठ मंत्री हों सबकी स्थिति ऐसी है कि वो अपने क्षेत्र में भी उम्मीदवारों को चुनाव नहीं जिता सकते। 2022 में मौजूदा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या चुनाव हार गये थे। इसलिए अब यूपी में योगी है तो मुमकिन है का सहारा लेना पड़ेगा। सहयोगी दल भी भले ही अंदर से नाराज हो लेकिन उनका मानना है कि योगी के चेहरे पर ही चुनाव जीता जा सकता है। क्योंकि जमीनी हकीकत भाजपा के लिए ठीक नहीं है। योगी का चेहरा ही नैया पार लगा सकता है। सहयोगी दलों की सीटों को लेकर अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ है लेकिन भाजपा हाईकमान के सूत्रों पर भरोसा करें तो भाजपा अपने पास तीन सौ से अधिक सीटें रखना चाहती है। 403 सीटों में से 315 के आसपास भाजपा रखना चाहती है और 88 सीटों में सहयोगी दल राष्टï्रीय लोकदल, निषाद पार्टी सुहेलदेव समाज पार्टी और अपना दल को निपटाना चाहती है। हालांकि ओमप्रकाश राजभर इस बार कुछ ज्यादा सीटें चाहते हैं। वैसे उन्होंने एक नया रास्ता भी निकाला है। उनका प्रयास है कि अगर विधानसभा में कम सीटें मिलती है तो विधान परिषद के होने वाले चुनाव में एक सीट पर उनका भी उम्मीदवार खड़ा होना चाहिए। वहीं अपना दल भी इस बार ठीकठाक सीट चाहता है। निषाद पार्टी के प्रमुख डॉ. संजय निषाद के हालिया बयान और अपनी ही सरकार में धरने पर बैठने की जो तस्वीरें सामने आयी हैं उससे भाजपा नाराज है। इसलिए उनको हल्के में लिया जाएगा। वहीं सबसे ज्यादा सीटों की डिमांड राष्टï्रीय लोकदल से हो रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई ऐसी सीटों पर रालोद का दावा है जिसमें अधिकतर सीटों पर भाजपा के सीटिंग एमएलए हैं। दो सीट ऐसी हैं जिन पर सपा के विधायक हैं। वहीं आगरा मंडल में भी रालोद कई सीटें मांगना चाहता है। सबसे अधिक डिमांड रालोद की तरफ से ही है। वैसे भाजपा रालोद को नाराज करने के मूड में नहीं है। क्योंकि पश्चिम में रालोद के सहारे ही भाजपा की नैया पार लग सकती है। वैसे रालोद प्रमुख जयंत के भाजपा के साथ जाने से जाट समाज भी नाराज है लेकिन फिर भी आज भी रालोद के साथ जाट कहीं ना कहीं खड़ा नजर आता है। यही उसकी ताकत है और सपा प्रमुख अखिलेश यादव का चवन्नी वाला बयान रालोद के लिए जरूर संजीवनी बूटी ताकत हो सकता है। जय हिंद