आखिर ऐसा क्यों होता है?
एक अजीब तस्वीर दशकों से देखी जा रही है कि सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि चाहे वो सांसद हों, विधायक हों, एमलसी हों या मंत्री हों, जनता की समस्या पर वो मौन रहते हैं। हर चुनाव में उम्मीदवार जब जनता के बीच जाता है तो बड़े-बड़े वायदे करता है। कहता है आपका पसीना गिरेगा तो मैं खून बहा दूंगा, एक बार सरकार बना दीजिए आपके साथ खड़ा नजर आऊंगा। सरकार बन जाती है तो यही जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं से ये कहकर पलड़ा झाड़ लेते हैं कि हमारी सरकार है हम अपनी सरकार के खिलाफ कैसे बोल सकते हैं। विपक्ष के जनप्रतिनिधि के पास जाओ उसका एक टका सा जवाब होता है क्या करें हमारी सरकार नहीं है इसलिए हम आपकी क्या मदद करें। आखिरकार जनता को ये बेवकूफ बनाने का सिलसिला कब बंद होगा। एक बार नहीं कई बार देखा गया कि सत्ता पक्ष का जनप्रतिनिधि यही कहता है कि वो मजबूर हंै, अधिकारी नहीं सुन रहे हैं लेकिन क्या करें। ये बात अगर जनता में आयेगी, मीडिया में आयेगी तो सरकार की बदनामी होगी तो फिर जनता किसके पास जाए। असली जनप्रतिनिधि वो है जो हक बात कहे, जनता के साथ खड़ा रहे चाहे उसे अपनी सरकार के खिलाफ ही क्यों ना बोलना पड़े। आज से पांच दशक पहले इस तरह के जनप्रतिनिधि होते थे कि वो अपनी ही सरकार की कमियों के खिलाफ धरने पर बैठ जाया करते थे। आज स्थिति ये है कि धरने पर बैठना तो बहुत दूर फोन पर अधिकारी को हडक़ाते हुए घबराते हैं। कहते हैं कि इसकी ऊंची पहुंच है ये हमारी शिकायत कर देगा। ये बात ठीक है कि आज अफसरों का राजनीतिकरण हो गया है। बड़े पदों पर बैठे मंत्री और हाईकमान अफसरों से ही जनप्रतिनिधियों का फीडबैक लेते हैं। पहले जनप्रतिनिधियों से अफसरों का फीडबैक लिया जाता था। इसी कारण सरकारी मशीनरी हावी हो रही है। इसलिए जरूरत इस बात है कि जनप्रतिनिधि अपनी आवाज बुलंद करें भले ही उन्हें हाईकमान की नाराजगी झेलनी पड़े लेकिन असली अदालत और जनता की ताकत ही जनप्रतिनिधि की पहचान है। माननीय का दर्जा, जनप्रतिनिधि का दर्जा जनता ही देती है इसलिए जनता को सर्वोपरि रखे और सही को सही कहने की हिम्मत पैदा करें। जिसके साथ जनता होती है उसका हाईकमान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जय हिंद