किस लिए चुने जाते हैं जनप्रतिनिधि
संसद के मानसूत्र का आज चौथा दिन है लेकिन हर रोज की तरह आज भी हंगामा हुआ और संसद स्थगित कर दी गई। 19 जुलाई से यही तस्वीर चल रही है। सडक़ से लेकर संसद तक हंगामा है। विपक्षी सांसद सडक़ों पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं। छात्र अपने भविष्य को लेकर सडक़ों पर हैं, सरकार बयानबाजी में व्यस्त है, किसान भी सडक़ों पर उतरने को तैयार हैं। अगर सारे फैसले सडक़ों पर ही होने हंै तो फिर संसद भवन को बंद कर देना चाहिए। एक अजीब सी तस्वीर दिखाई दे रही है। दो दशक पहले भी संसद सत्र हुआ करते थे। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच बहस हुआ करती थी, संसद भवन में नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी का अंदाज आज भी सभी को याद है। अगर सत्ता पक्ष कोई अच्छा काम करता था तो वाजपेयी जी पूरे सदन में उसकी प्रशंसा करते थे। विपक्ष में होने के बाद भी वो सराहना करते थे। बहस होती थी लेकिन कभी भी संसद की कार्रवाई लगातार स्थगित नहीं होती थी क्योंकि सभी को जनता के मुद्दो पर बात करना होती थी। आज दो दशकों बाद संसद की जो तस्वीर है वो सभी के सामने है। सबकुछ एक दिखावा बनकर रह गया। हर बार संसद सत्र शुरू होने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाती है। विपक्षी नेता आते हैं चाय की चुस्कियां लेते हैं, सत्ता पक्ष के साथ बैठकर ठहाके लगाते हैं और कहते हैं सबकुछ ठीक होगा। लेकिन जब संसद का सत्र शुरू होता है तो वही नेता कार्यवाही चलने नहीं देते। ये लोग भूल जाते हैं कि संसद की कार्यवाही पर करोड़ों रुपया खर्च होता है। सांसदों को भत्ता भी मिलता है और भी बहुत कुछ मिलता है ये सब किसके टैक्स से अदा होता है ये हंगामा करने वाले भूल जाते है। जिन्हें माननीय का दर्जा जनता ने दिया है और करोड़ों रुपये का जो खर्च होता है उसका टैक्स भी जनता ही देती है और जनता इस उम्मीद के साथ अपना प्रतिनिधि चुनती है कि उसकी आवाज और मुद्दे संसद में उठाये जाये। आज तो और हद हो गई एनडीए के सांसद प्रधानमंत्री के आवास पर धरना दिये जाने को लेकर राहुल गांधी के खिलाफ ही बैठ गये। देखा गया है कि जनता के मुद्दों से कोई मतलब नहीं, व्यक्तिगत लड़ाईयां लड़ी जा रही हैं। अगर वास्तव में मुद्दों पर चर्चा करनी है तो हंगामा न करके सत्ता और विपक्ष के बीच सहमति बने और जनता के मुद्दों पर चर्चा हो। सरकार भी चर्चा सुनने के लिए तैयार होना चाहिए अगर सबकुछ सडक़ों पर ही तय होगा तो इन सदनों की क्या जरूरत है। जय हिंद