दिल्ली में पिछले तीन दिन से जो कुछ हो रहा है वह कोई सामान्य बात नहीं है। अगर कोई यह कहे कि सरकार हठधर्मिता कर रही है वह गलत नहीं है, कोई यह कहे कि विपक्ष राजनीतिक रोटी सेंक रहा है तो वह भी गलत नहीं है, कोई यह कहे कि संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा बर्दाश्त करने योग्य नहीं है तो वह भी गलत नहीं है और कोई यह कहे कि राहुल गांधी को कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ प्रधानमंत्री के आवास पर धरना नहीं देना चाहिए था तो गलत वह भी नहीं है। दरअसल आंदोलन काकरोच जनता पार्टी का हो, सवाल सरकार की मंशा का हो या विपक्ष की नीयत का, कसर तो कोई भी नहीं छोड़ रहा है। केन्द्र सरकार को आंदोलनकारियों से संवाद जून में करना चाहिए था, मगर उसने नहीं किया। वांगचुक को डाक्टरों की बात मान लेनी चाहिए थी उसने नहीं मानी, काकरोच जनता पार्टी को ना तो संसद कूच करना था और ना हिंसा करनी थी मगर उन्होंने दोनों काम किए। सरकार को मानसून सत्र के पहले दिन ही स्पष्टï कर देना चाहिए था कि पेपर लीक पर चर्चा होगी मगर उसने ऐसा नहीं किया। मंगलवार को सरकार ने चर्चा करना स्वीकार कर लिया था, उसके बाद राहुल गांधी को सडक़ से हट जाना चाहिए था, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। आज जो केन्द्र में शिक्षा मंत्री हैं धमेन्द्र प्रधान, जब वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में महासचिव थे तो पेपर लीक को लेकर निरंतर सडक़ पर दिखाई देते थे। मगर आज जब उनके कार्यकाल में पेपर लीक हो रहे हैं तो वह कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। उनका एक बयान देखा जिसमें उन्होंने कहा कि जब अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे तब इतनी संख्या में पेपर लीक की घटनाएं हुईं, लगे हाथ प्रधान यह भी बता देते कि क्योंकि अखिलेश सरकार में पेपर लीक हुए थे, केवल इस वजह से उनके कार्यकाल में हुई पेपर लीक की घटना को माफ कर दिया जाए? आंदोलनकारी छात्रों को माओवादी, खालिस्तानी कहना बर्दाश्त नहीं है। मगर छात्र आंदोलन में पत्थरबाजी और गैर छात्रों का हंगामा भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राहुल गांधी ने क्या समझा कि वह प्रधानमंत्री आवास के गेट पर धरना देंगे और देश का युवा वहां टूटकर पड़ेगा, नहीं साहब यह श्रीलंका या नेपाल नहीं यह भारत है। हमारे युवा और छात्र दोनों जानते हैं कि मांग अपनी जगह हैं और राष्टï्र सुरक्षा अपनी जगह। हमारा जेन जेड इतना नासामझ नहीं है। दूसरा भारत में हिंसक आंदोलन से सत्ता पलट नहीं किया जा सकता। यहां लोकतंत्र बहुत मजबूत है। बाकी सभी पक्ष अगर सही से अपना दायित्व निभाएं तो शायद ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं हो।