बात तो करनी ही चाहिए
आवाज उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, समस्या के समाधान और बातचीत करने की जिम्मेदारी भी सत्ता में बैठी सरकारों की होती है। बातचीत से बड़ी-बड़ी समस्याएं हल होती है, हंगामे और आंदोलनों से बातचीत का रास्ता ही निकलता है। मौजूदा माहौल में आंदोलन का प्रभाव कम करने के बहुत तरीके निकल चुके हैं। आपको याद होगा देश का किसान कई माह तक आंदोलन करता रहा, सडक़ों पर रहा, लेकिन कोई बातचीत नहीं हुई और आज भी किसान उसी रास्ते पर है। जिस तरह कॉकरोच पार्टी आंदोलन कर रही है। ये आंदोलन एक भीड़ का हिस्सा जरूर है लेकिन मजबूत नेतृत्व नहीं होने के कारण ये गलत रास्ते पर भी जा सकता है। कल सरकार ने इनसे बात की ये अच्छा प्रयास है। लेकिन उसका क्या हल निकला ये सभी के सामने है। कल जिस तरह से जंतर-मंतर से छात्र और आंदोलनकारी संसद भवन की तरफ चल पड़े उन पर जो लाठियां बरसाई गई वो भी सभी के सामने है। एक मिसाल है जब तक बच्चा रोता नहीं मां उसे दूध नहीं पिलाती लेकिन आज के दौर में ये मिसाल चरितार्थ नहीं हो रही है। आज आप अपने अधिकारों के लिए रोओगे तो लाठियां मिलेगी। बहरहाल, देश की संपत्ति भी हमारी संपत्ति है, आंदोलन हिंसक ना हो ये बहुत जरूरी है। विपक्षी नेताओं का तो काम यही है कि वो हमेशा दूसरों के कंधों पर बंदूकें चलाते आये हैं। सरकार को चाहिए कि वे अहम से बाहर निकले और बच्चों की बात सुनें। देश इस समय मजबूत हाथों में है ये सब जानते हैं। इसलिए ये आंदोलन सरकार की छवि खराब कर रहे हैं इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। एनडीए नेताओं की बैठक में प्रधानमंत्री ने पेपर लीक को गंभीर माना है और कार्रवाई की बात भी कही है भविष्य में पेपर लीक ना हो इस पर भी चर्चा की है। यही बात अगर संसद में हंगामा कर रहे विपक्ष को भी बता दी जाए तो अच्छा होगा। दो दिन से संसद का सत्र शुरू हुआ है लेकिन हंगामा जारी है। विपक्ष को भी चाहिए हंगामा करके उसे कुछ हासिल नहीं होगा कम से कम शांति के साथ अपनी बात संसद में रखे। बहरहाल, आज की राजनीति केवल शोर-शराबा और हंगामे तक सीमित रह गई असली मुद्दों से सब दूर हो गये हैं। जय हिंद